मंगलवार, 3 जनवरी 2017

नोटबंदी से कितना बदला देश ?


नोटबंदी के जरीये 50 दिन में देश में बड़ा बदलाव करने का दम भरा गया... देशभर में कतारें लगी...रात दिन लोग लाइनों में खड़े अपने पैसे का इंतजार करते रहे...इकॉनेामी से कालाधन निकालने का जो दावा सरकार ने किया वो भी अब तक साफ नहीं है....कहा गया था कि नोटबंदी से क़रीब ढाई-तीन लाख करोड़ रुपये की 'काली नक़दी' बैंकों में नहीं लौटेगी... और ये काला धन पकड़ में आएगा लेकिन खुद बैंकों में कितना धन जमा हुआ इसका आंकड़ा दस दिसंबर के बाद से जाहिर नहीं किया गया... दस दिसंबर तक ही करीब 13 लाख करोड़ जमा हो गया था जबकि अनुमान ये था कि 500 और 1000 के नोटों जो आरबीआई ने अब तक छापे हैं वो 14-15 करोड़ के आस पास हैं....

सवाल उठता है कि अगर कालाधन था तो क्या वो भी बैंकों में जमा हो गया या फिर कालाधन उतना नहीं था जितना दावा किया गया... और अगर ऐसा है तो कालेधन पर वार करने वाली नोटबंदी से क्या हासिल हुआ...

बात सिर्फ नोट बदलने की होती तो शायद इतना फर्क नहीं पड़ता लेकिन अचानक बड़े नोट सरकुलेशन से बाहर होने से अर्थव्यवस्था पर इसका उल्टा असर पड़ा...खुद आरबीआई मान रहा है कि देश की इकॉनोमिक ग्रोथ धीमी हुई है.... इस साल विकास दर 7.6% से घट कर 7.1% ही रह सकती है.

नोटबंदी से न तो कालाधन रूका और न ही भ्रष्टाचार कम होने की कोई उम्मीद दिखाई देती है क्योंकि सिस्टम में अब तक कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ.... कुछ दिन बाद जब बैंकों से ट्रांजेक्शन बेहतर होगी तो लोग फिर वही रिश्वतखोरी दिखाई दे सकती है... पिछले दो साल से भ्रष्ट देशों की सूची में भारत की रेंकिंग नहीं सुधरी है भ्रष्टाचार निगरानी संस्था ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' की साल 2015 की रिपोर्ट में बताया गया है कि सौ अंकों वाले ‘करप्शन स्केल' में भारत का स्कोर 38 है और इसमें 2014 से कोई बदलाव नहीं हुआ है जबकि ये 168 देशों की सूची में नौ स्थान उपर चढ़ा है. इंटरनेशनल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2015 के मुताबिक सूचकांक सूची में भारत का रैंक 76 है. इसमें डेनमार्क 91 स्कोर के साथ शीर्ष पर है. भारत के साथ इस सूचकांक में थाईलैंड, ब्राजील, ट्यूनीशिया, जांबिया और बुर्किनाफासो भी 76 वें स्थान पर हैं. चीन 37 स्कोर के साथ 83वें स्थान पर, पाकिस्तान 30 स्कोर के साथ 117 वें स्थान पर और 25 स्कोर के साथ बांग्लादेश 139 वें स्थान पर है.


जल्द ही इस साल की सूची भी जारी होगी और अब नोटबंदी के दौरान सामने आया करप्शन ये बता ने के लिये काफी है कि अपने देश में करप्शन खत्म करना एक ऐसा टास्क है जो 50 दिन की नोटबंदी से नहीं हो सकता.. जैसे बीमारी का इलाज करने के लिये उसकी जड़ तक पहुंचना जरूरी होता है वैसे ही करप्ट लोगों की पहचान कर उन्हें सिस्टम से बाहर करके ही करप्शन को खत्म किया जा सकता है....






बैंक क्यों भूल गये अपनी जिम्मेदारी ?


कालाधन रोकने के लिये सरकार ने जो रास्ता चुना वो एक हद तक सही है बैंकों के जरीये लेन देन करने या डिजिटल तरीके से पेमेंट हो तो पारदर्शिता बढ़ेगी और टैक्स चोरी भी कम होगी लेकिन नोटबंदी और कैशलेस होने का जो मंत्र सरकार ने दिया उसे लागू करने के लिये व्यवस्था को बड़े स्तर पर बदलने की जरूरत थी जो किया नहीं गया... अपने देश में सिर्फ़ तीस-बत्तीस प्रतिशत लोगों के पास ही बैंक या पोस्ट ऑफ़िस खाते हैं जब ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़े बैंकिंग सुविधाओं और डेबिट- क्रेडिट कार्ड से अछूते हैं बड़े शहरों की भी ज़्यादातर दुकानों पर क्रेडिट-डेबिट कार्ड स्वीकार ही नहीं किया जाता लेकिन सरकार ने फिर भी कहा कि कैशलेस या नक़दीरहित लेन-देन की तरफ़ बढ़ना चाहिए...


नोटबंदी का कदम उठाया तो गया था बड़ी उम्मीदों के साथ लेकिन जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा किया गया उन्होंने ही सरकार और जनता देानों के साथ धोखा किया.... कई प्राइवेट बैंकों ने बड़े पैमाने पर कमीशन लेकर नोटों को बदला... यहां तक की फर्जी एकाउंट बनाकर करोड़ेां रुपये बैंकों में जमा भी हो गए...


नोटबंदी के बाद जांच के घेरे में आए एक्सिस बैंक में एक और घोटाला सामने आया है। आयकर विभाग ने दिसंबर के पहले हफ्ते में नोएडा के सेक्टर-51 स्थित बैंक की शाखा में छापा मारा। यहां 20 फर्जी खातों में करीब 60 करोड़ रुपये जमा करने का मामला पकड़ में आया।


फर्जी कंपनियों के नाम पर खाते बनाने में सबसे ज्यादा एक्सिस बैंक के अधिकारी फंसे... दिल्ली और नोएडा में एक्सिस बैंक की शाखाओं पर आयकर विभाग ने छापेमारी कर फर्जी कंपनियों के एकाउंट पकड़े... कोटक महिंद्रा और एचडीएफसी जैसे नामी बैंकों में भी फर्जीवाड़े हुए. देश के बैंकों की कई शाखाओं में पुलिस-दलाल और प्रभावशाली लोगों का धन बदला जाने लगा जिसके पुख़्ता सुबूत रिकार्ड भी हुए. दस दिसंबर तक 200 करोड़ रुपये जब्त किए गये


नोट बंदी के बाद से ही एनफोर्समेंट डिपार्टमेंट ने उन धन कुबेरों पर अपनी नजर बनाए हुई थी जो अपने काले धन को सफ़ेद करने की फ़िराक में थे... ईडी ने दिल्ली के वकील रोहित टंडन के साथ साथ पारसमल लोढा... शेखर रेडी... और कोटक बैंक मैनेजर आशीष को गिरफ्तार किया. पेशे से दिल्ली के जाने माने वकील है रोहित टंडन... सुप्रीम कोर्ट में वकालत के साथ साथ 2005 में रोहित टंडन ने ZESU के नाम से एक लॉ फर्म की शुरुवात की बाद में टीएंडटी लॉ फर्म के नाम से भी एक कंपनी शुरू की.... वकील रोहित टंडन के दिल्ली में कई बेनामी सम्पति के मालिक है जिसमे जोरबाग इलाके में 100 करोड़ का बंगला भी शामिल है। पिछले दिनों रोहित टंडन के दिल्ली स्थित ऑफिस पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने छापा मारा था...जिसमें 13.65 करोड़ की नकदी बरामद हुई थी...जिसमें 2.26 करोड़ की नई करेंसी थी...टंडन पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी खातों के माध्यम से 76 करोड़ के काले धन को सफेद किया है...जिसमें कई बैंकों के बड़े अधिकारी भी शामिल है...कोटक महिन्द्रा बैंक के मैनेजर आशीष की भी गिरफ्तारी ईडी ने की ...उसके संबंध रोहित टंडन और पारसमल लोढ़ा से भी है...ईडी ने रोहित टंडन के मोबाइल से व्हाट्सएप के जरिए कई लोगों से बातचीत का ब्योरा भी बरामद किया था..


काला धन खत्म करने को लेकर नोटबंदी लागू की गई थी. जिससे दस दिसंबर तक ही करीब 13 लाख करोड़ रूपए बैंक में आ गये लेकिन नोटबंदी के बाद जनता की परेशानी और कैश की किल्लत जब बढ़ने लगी और नई करेंसी की करोड़ों की खेप पकड़ी जाने लगी तो एक बार फिर पीएम सामने आये और कहा कि बैंक वाले भी नहीं बचेंगे क्योंकि देश के बैंकों की करीब 500 शाखाओं का स्टिंग करवाया है. वित्त मंत्रालय में स्टिंग ऑपरेशन के सीडी पहुंच चुकी हैं.


दिसंबर शुरू होते ही एक हफ्ते के अंदर एक्सिस बैंक के दो मैनेजर 40 करोड़ के घोटाले में दिल्ली से गिरफ्तार किए गए. इनके अलावा एक्सिस बैंक ने अपने 19 कर्मचारियों पर कार्रवाई की, कोलकाता में केनरा बैंक के डिप्टी मैनेजर, राजस्थान के अलवर में कोऑपरेटिव बैंक मैनेजर, पंजाब के बठिंडा में ओबीसी बैंक के मैनेजर-कैशियर, बैंगलूरु में सेंट्रल बैंक के मैनेजर और हैदराबाद में सिंडिकेट बैंक के दो कर्मचारी गिरफ्तार गए .

ये भी कहा गया कि बैंक अधिकारियों पर फिलहाल हल्की कार्रवाई रणनीति का हिस्सा है. एक बार करेंसी का संकट कुछ सुधरे तो सरकार भ्रष्ट बैंक पर सबक सिखाने वाली कार्रवाई करेगी. जो फरवरी मार्च के करीब हो सकती है. हांलाकि नोटबंदी में बैंकों की भूमिका बहुत संवेदनशील औऱ महत्वपूर्ण मानी गई लेकिन कुछ बैंकों की गड़बड़ी से देश को काफी नुकसान उठाना पड़ा.


क्या नोटबंदी अकेला विकल्प था कालेधन के खिलाफ ?



नोटबंदी को सरकार कालाधन के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार मानकर आगे बढ़ी लेकिन जैसे जैसे दिन बीते बैंकों की कतारें बढ़ने लगी और एटीएम कैशलेस हो गये...लेकिन फिर भी लोग सरकार के साथ खड़े दिखे... घंटों लाइन में लग कर भी हर तकलीफ सहने का जज्बा उनमें दिखा... देश की खातिर ये सब सहन कर रहे थे लेकिन दिन बीतने के साथ भी जब हालात सुधरते नहीं दिखे तो सब्र का बांध टूटने लगा...कहते हैं कि व्यवस्था के फैसले पर सवाल खड़े करने के अधिकार की जगह अगर जनता पर महज रजामंदी जाहिर करने का दबाव हो तो ये लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। इस सैद्धांतिक टेक के साथ नोटबंदी के सरकार के हालिया फैसले पर गौर करें तो इसे फौरी तौर पर सराहने वाले भी अब कहने लगे हैं कि सरकार ने ये फैसला जल्दबाजी में लिया है। बेहतर होता कि सरकार फैसले के इस विकल्प तक पहुंचने से पहले और थोड़ा सोच लेती.... लोगों की जुबां पर न सही लेकिन हर किसी के जहन में ये सवाल जरूर आया कि आखिर नोटबंदी के बड़े एलान से पहले सरकार ने ऐसी पक्की व्यवस्था क्यों नहीं कि जिससे आमजनों को हो रही परेशानी से बचाया जा सकता। ये भी कि क्या ये कालेधन से निपटने का एकमात्र मुफीद तरीका रह गया था?


कई विशेषज्ञ ये मानते हैं कि सरकार के पास तमाम ऐसी जानकारियां हैं, जिससे वे अवैध धन इकट्ठा करने वालों के गिरेबान सीधे पकड़ सकती है.... मोदीजी खुद कहते रहे हैं कि सरकार की नजर उन पर है जो कालाधन दबाए बैठे हैं


दिलचस्प बात ये है कि फैसला नोट बदलने का लिया गया और धरपकड़ तब शुरू हुई जब लोगों ने शिकायत की कालाधन रखने वाले इसमें भी जुगाड़ ढूंढ रहे हैं.. अर्थव्यवस्था को जानने और समझने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि पुराने बड़े नोटों को अमान्य करने का जो काम अचानक हुआ उसकी जगह क्रमिक तौर पर छपाई बंद करने का विकल्प ज्यादा बेहतर होता। इससे धीरे-धीरे बड़े नोट खुद ब खुद प्रचलन से बाहर हो जाते। पर सरकार ने ऐसा न कर एक ऐसा फैसला किया जिसमें घुन और गेंहू साथ-साथ पिस रहे हैं। ये तमाम सवाल मौजूदा हालात में इसलिए जरूरी हैं क्योंकि सरकार की तरफ से अब भी कोई ऐसा आश्वासन नहीं कि वो आमजनों की परेशानी के साथ बिगड़े हालात पर जल्द काबू पा लेगी। एटीएम में कैश भले ही डल रहा हो लेकिन बैंकों से पैसा निकलने की लिमिट अब भी तय है जब ये पाबंदी नहीं हटेगी तब तक हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते....


वित मंत्री अरूण जेटली बड़े आराम से ये कह कर निकल जाते हैं कि सरकार का हैरान करने वाला ये कदम अगर पहले से बता देते तो इसकी गोपनीयता खत्म हो जाती लेकिन इसके लिये आम लोगों के सब्र की परीक्षा लेने का विकल्प ही क्यों सरकार को पंसद आया इसका सीधा जवाब सरकार की तरफ से कोई नहीं दे रहा। प्रक्रिया की जटिलता और इसमें लगने वाले समय ने लोगों को जो तकलीफे दी... लाइनों में लग कर जिन लोगों ने जान गवाई उनके परिवार ये सवाल क्यों न करें कि सरकार कालेधन वालो को सजा दे रही है या उन्हें.....विकल्प की बात हो तो ये सवाल तर्क के लिहाज से और वाजिब तब लगता है जब समाज का हर तबका इससे परेशान हो.... सवाल ये है कि सरकार को भी पता था कि देश में कुल 17 लाख करोड़ की करेंसी में 8.2 लाख करोड़ (5०० के नोट) और 6.7 लाख करोड़ (1००० के नोट) पूरी करेंसी का 86 फीसदी हैं, जो अब प्रचलन से बाहर हो गए हैं। इससे पैदा होने वाले संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में नगदी नोटों से आम जनता की अर्थव्यवस्था चलती है, जबकि बड़े लोग बैंकिग प्रणाली से कारोबार करते हैं। सरकार चाहती तो ऐसे में 2.7 लाख करोड़ के रोजाना बैंकिग ट्रांजेक्शन और सालाना 8०० लाख करोड़ के बैंकिग कारोबार में बड़े लेनदेन को सीधे अपने स्कैन पर ले सकती थी और जांच के बाद संबंधित लोगों-कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती थी। सीबीआई डायरेक्टर एपी सिह ने फरवरी 212 में ये बताया था कि कालेधन के नाम पर लगभग 3० लाख करोड़ रुपए विदेशों में जमा हैं। 214 के लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी ने इस धन को देश में लाने की बात कही थी। पर अब इस वादे को पूरा करने के बजाय सरकार देश की मुद्रा व्यवस्था को बदलने की एक ऐसी कार्रवाई कर रही है जिसने जनता को बैठे-बिठाए मुसीबत में डाल दिया है जबकि सरकार के सामने दूसरे विकल्प भी थे। हाल के पनामा लीक्स में देश के
5०० रसूखदार तथा एचएसबीसी में 1,195 लोगों के पास कालाधन होने का पता चला था। इसी तरह कुछ बड़े उद्योगपतियों द्बारा बैलेंसशीट में गड़बड़ी करके सरकारी बैंकों से 15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का लोन लिया गया जिसमें अधिकांश एनपीए में तब्दील हो गया है। और तो और रिजर्व बैंक का खुद का आंकड़ा है कि पिछले 44 वर्षों में एक्सपोर्ट और ओवर इनवाइसिग के माध्यम से बड़ा घोटाला हुआ है जो कुल जीडीपी का एक चौथाई हो सकता है। सरकार चाहती तो ऐसे बड़े समूहों और उद्योगपतियों के फारेंसिक और सीएजी ऑडिट कराने का फैसला कर सकती थी। इससे देश में एक नए कारोबारी वित्तीय अनुशासन को अमल में लाने का श्रेय भी सरकार को मिलता। पर उसने ऐसा नहीं करके बेकसूर आम जनता के लिए परेशानी बढ़ाने वाला फैसला लिया।
साफ है के कालाधन के खिलाफ सार्थक और अचूक कार्रवाई के बजाय सरकार एक ऐसे कदम को तरजीह दे रही है जिसका फायदा वो राजनीतिक लोकप्रियता के लिए कर सके।




करेन्सी पर 'वार' हुआ कामयाब?




पीएम नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एलान किया... इसे एक रास्ता बताया कालेधन को खत्म करने का... लेकिन आंकड़े तो कुछ और कहते हैं आंकड़े ही क्यों खुद प्रधानमंत्री बोल चुके हैं कि बच्चा बच्चा जानता है कि कालाधन विदेश में हैं



सच ये है कि करेन्सी पर 'वार' कर ज्यादा से ज्यादा उतने ही काले धन को निशाना बनाया जा सकता है जो मुद्रा के तौर पर चलन में है. जैसे अभी तक 14 लाख करोड़ रुपये मूल्य से कुछ ज़्यादा के पाँच सौ और हज़ार के नोट चलन में थे, जो देश की जीडीपी के दस प्रतिशत के बराबर है. अनुमान है कि पाँच सौ और हज़ार के इन नोटों का क़रीब एक चौथाई हिस्सा काला धन है, जो हुआ क़रीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये. यानी जीडीपी का कुल ढाई प्रतिशत. अब इसमें से जो भी काला धन सरकार की पकड़ में आ जाये, वो आ जाये. ज़ाहिर है कि ये पूरी काली अर्थव्यवस्था की एक चुटकी भर रक़म ही होगी और इसका ऐसा असर कैसे होगा कि आगे काला धन बनना बन्द हो जाये! खुद पीएम और जानकार मानते हैं कि कालाधन ज्यादातर विदेशों में जमा है कुछ एक्सपर्ट तो यहां तक कह रहे हैं कि 90% कालाधन विदेशी मुद्रा में होता है न कि भारतीय नोट की शक्ल में.... तो फिर सवाल ये है कि आखिर देश में नोटबंदी का फायदा क्या हुआ ?

अपने देश के वित्तीय इतिहास को खंगाले तो इससे पहले दो बार बड़े नोटों पर तथाकथित 'सर्जिकल स्ट्राइक' की जा चुकी है. पहली बार 1946 में एक हज़ार और दस हज़ार रुपये के नोट बन्द किये गये थे. उसके बाद 1978 में मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने एक हज़ार, पांच हज़ार और दस हज़ार के नोट बन्द किये थे. देसाई सरकार में मनमोहन सिंह ही वित्त सचिव थे. मक़सद यही था. काले धन को बाहर निकालना. लेकिन दोनों बार इस मक़सद में कोई कामयाबी नहीं मिल सकी. ये बात ख़ुद वित्त मंत्रालय की 2012 की उस रिपोर्ट में दर्ज है, जिसे केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष के नेतृत्व में बनी कमेटी ने पेश की थी. शायद पुराना अनुभव था. इसीलिए मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने तो बड़े नोटों को रद्द करने के सुझावों को उन्होंने कभी गम्भीरता से नहीं लिया. और मोदी के नोटबंदी के खिलाफ भी संसद में बयान दिया...

सिर्फ अपने देश की बात क्यों करें विदेशों में भी कोई ऐसा उदाहरण नहीं है जहां नोटबंदी ने कालेधन को खत्म किया हो...पड़ोसी म्यांमार में 1964 और 1985 में यही प्रयोग किया गया और नाकामयाबी हाथ लगी. इसके बाद भी वहां तीसरी बार फिर 1987 में मुद्रा रद्द कर दी गयी इस बार तो ये लोगों के लिये भारी मुसीबतें लाई क्योंकि जब तीसरी बार ये किया गया तो पुराने बड़े नोटों के बदले में कुछ भी दिया नहीं गया. यानी क़रीब तीन-चौथाई मुद्रा लोगों के हाथ से बिलकुल निकल गयी. लेकिन इतने कड़े फैसले के बाद भी क्या वहां काले धन की समस्या ख़त्म हो गयी? नहीं. बल्कि उससे हुआ ये कि वहां के वित्तीय संस्थानों से लोगों का भरोसा उठ गया और पैसा सिर्फ़ ज़मीन और सोने में लगाया जाने लगा. जिसके नतीजे और गंभीर हो गये क्योंकि ये स्थिति अर्थव्यवस्था को जड़ कर देती है सोने और ज़मीन में लगे धन का इस्तेमाल किसी उत्पादक काम में तो होता नहीं तो अर्थव्यवस्था का पहिया कैसे घूमे?
इसी तरह श्रीलंका में भी 1970 में ऐसा किया जा चुका है. वहां तो सौ और पचास तक के नोट बदल दिए गये थे. लेकिन ये प्रयोग भी विफल ही रहा. इधर वेनेजुएला को ही लीजिए जिसने भारत की नोटबंदी के बाद अपने यहां भी इसे किया लेकिन एक हफ्ते में बवाल के बाद फैसले को सरकार को वापस लेना पड़ा....






क्या वाकई नोट बदलने से काला धन ख़त्म हो जायेगा?

काले धन का सीधा रिश्ता टैक्स चोरी है लेकिन इसमें भ्रष्टाचार, ड्रग्स व्यापार, हथियारों की तस्करी, हवाला, आतंकवाद सब शामिल हैं... विदेशी बैंकों में जो काला धन जमा है वो देश की साधारण जनता का है, ग़रीबों, किसानों, कुलियों और मज़दूरों का है.



एक तरफ अरबों का कालाधन है और दूसरी तरफ मौजूदा वक्त में देश के आम लोग हर रोज जूझ रहे हैं कभी महंगाई तो कभी अपने जीवन स्तर को सुधारने की कोशिश में... बीते एक बरस में देश में प्रति व्यक्ति आय की रफ्तार में महज 8हजार रुपये की बढोतरी हुई है और इसी दौर में बीपीएल परिवारों की लकीर प्रतिदिन 27 रुपये और 35 रुपये की बहस अटकी है यानी जब देश में एक तरफ 40 करोड लोग सालाना 10 हजार रुपये से कम पाते हो । और दूसरी तरफ प्रति व्यक्ति आय सालाना 93,293 हजार रुपये आते हो । तो समझ लेना चाहिये कि देश में असमानता की खाई कितनी चौडी है इस खाई को पाटने के लिये आठ नवंबर 2016 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक ऐलान करते हुए समाजवाद का सपना नोटबंदी के जरीये जगाया...



कालेधन को खत्म कर लोगों के हक की बात की तो पूरा देश प्रधानमंत्री के पीछे खड़ा नजर आया.. .पीएम ने कहा तो कि कालाधन की गंभीर बीमारी का इलाज नोटबंदी से हो जाएगा लेकिन क्या वाकई नोट बदलने से काला धन ख़त्म हो जायेगा? बहस जारी है अर्थशास्त्री मानते हैं कि काला धन मतलब करेन्सी नहीं है करेन्सी का काम लेन-देन करना है ये धन नहीं है करेंसी बदलकर काला धन खत्म नहीं होगा. क्योंकि काला धन सिर्फ करेंसी में नहीं है ये धन देश के अलावा हवाला से बाहर जाकर विदेशी बैंकों और विदेशी कम्पनियों में लगा है... ये काला धन विदेशी निवेश के रूप में वापस शेयर बाजार में भी आता है और यही काला धन राजनीति में चंदे के रूप में भी लगा होता है... 500 और 1000 रु के नोट बंद कर काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' और नरेन्द्र मोदी का 'मास्टरस्ट्रोक' बताया जा रहा है... नोटबंदी सरकार का साहसिक कदम है क्योंकि अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक असर होगा इस बात को हर कोई मान रहा था...सोचिए जहां अर्थव्यवस्था में 1000 के नोटों की संख्या 7 % और 500 के नोटों की संख्या 17.4% हो और जिन नोटों की कीमत पूरी अर्थव्यवस्था में मौजूद करेंसी की 64% हो जिसमें 24% 1000 के नोट और 40% 500 रु के नोट हो वहां रातों रात इसे बदलना कैसे आसान होगा.... सबसे बड़ा मसला उनका है जिनका घर नकद से चलता है देश में 47 करोड़ मजदूरों में से 41 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं इन 41 करोड़ मजदूरों में से भी 32 करोड़ सीधे नकदी कारोबार से जुड़े हैं.... इसके अलावा किसान छोटे व्यापारी.... दुकानदार सब नोटबंदी को लेकर पहले खुश दिखाई दिए लेकिन बाद में नोट बदलवाने की लाइनों में अपना वक्त बर्बाद होते देख अव्यवस्था को लेकर परेशान दिखे...
यानि नोटबंदी से क्या मिला ये सवाल फिर वहीं आकर अटकता है दरअसल जिस उम्मीद के साथ कालेधन पर सर्जिकल सट्राइक हुई वो पूरी करने के लिये सिर्फ नोट बदलना काफी नहीं...नोटबंदी के कुछ दिन बाद ही विपक्ष के हमले झेल रही मोदी सरकार ने भी अपना स्टैंड बदला और कैशलेस इकॉनोमी बनाने पर जोर दिया... यानि कैशलेस कैसे होगा देश जहां अरबो खरबों का पूरा साम्राज्य काम कर रहा है टैक्स चोरी के नये नये पैंतरें अपना कर बड़े उद्योग काली कमाई के दम पर चल रहे हैं रियल एस्टेट बाजार में कालाधन सफेद होता है जहां एक तरफ़ बिल्डर हैं, जो नम्बर दो के पैसे लेते हैं और अपने तमाम प्रोजेक्टों में उसे ईंट-गारे में खपा देते हैं. दूसरी तरफ़ होते हैं आम ख़रीदार जो सम्पत्ति की ख़रीद-फ़रोख़्त में काला धन लगाते हैं. और उनका क्या जो छोटे-बड़े कारोबार चलाते हैं... डॉक्टर-वकील जैसे पेशों से जुड़े हैं जो अपनी पूरी आमदनी घोषित नहीं करते और इस तरह अर्थव्यवस्था में काला धन जोड़ते हैं. बात तो उनकी भी है कि रिश्वत देते और लेते हैं जो अपनी ऐसी कमाई घोषित ही नहीं कर सकते.  
एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था के लूपहोल और जांच एंजेसियों में स्टाफ की कमी या सिस्टम में भ्रष्टाचार कालेधन को बढ़ाता है जो महज नोटबंदी से साफ होने वाला नहीं.... धन उगाही और इसे ब्लैक से व्हाइट करने में लगी हज़ारों लाखों कम्पनियाँ, फ़र्ज़ी आयात-निर्यात का मकड़जाल, काग़जों पर काली खेती, तरह-तरह के ट्रस्ट, धार्मिक संस्थाएँ और कई तरह के और उपकरण हैं, जहां जुगाड़ से 'बड़ा काला धन' सफ़ेद हो जाता है. इन छोटे छोटे ब्लैकमनी के गढ़ पर नोटबंदी के सर्जिकल स्ट्राइक का कितना असर होगा ये अभी कोई नहीं कह सकता...




कालाधन आखिर है क्या?

कालेधन का जिक्र जब आता है भ्रष्टाचार की तस्वीर भी जहन में उभरती है कालाधन वो भी है जहां लोग टैक्स चोरी कर पैसा बचाते हैं और वो भी जहां अपना काम करवाने के लिये रिश्वत दी जाती है रिश्वत का पैसा भ्रष्टाचार को सींचता है और देखते ही देखते पूरी व्यवस्था में भ्रष्टाचार जड़े जमाने लगता है एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में आजादी के बाद से 2014 तक राजनीतिक तौर पर जो घोटाले घपले हुए उसकी कुल रकम 21मिलियन मिलियन डॉलर यानि 9 करोड10 लाख 6 हजार 3 सौ 23 करोड 43 लाख रुपये है.... ये आकंड़ा इससे बड़ा भी हो सकता है शर्म की बात ये है कि जिस देश में 80 करोड़ लोग दो जून की रोटी के लिये हर दिन संघर्ष कर रहे हो वहां भ्रष्टाचारी अपने काले मंसूबों को बड़े आराम से अंजाम देकर एश कर रहे हैं.....सरकार भले ही कैशलेस होने की बात कर रही हो लेकिन उन मजदूरों का क्या जो पूरे दिन में 200 से 250 रुपये कमा कर अपने घर चलाते हैं अगले दिन का खर्च चलाने के लिये उन्हें फिर काम पर जाना होता... ऐसे में कौन सा पैसा बैंक में जमा होगा और कैसे कार्ड से पेमेंट करके वो कैशलेस हो जाएंगे.

कालाधन जब देश में बनता है तो इसे रखने के लिये तरह तरह की तरकीबें लगाई है कैश हाथ में रखना रिस्की हो तो विदेशी बैंकों के एकाउंट खोले जाते हैं... स्विस बैंक में जमा भारतीयों के पैसे को मुद्दा कई लोगों ने बनाया इसे लेकर राजनीतिक बिसात पर सियासत के कई मोहरे चले गये लेकिन आज भी खामोशी इस बात पर बरती जाती है कि स्विस बैंक में 1500 बिलियन डॉलर भारत के रईसों के ही जमा है और ये रकम ब्लैक मनी है जिसे भारत के गरीबों से छुपायी गई है

विकिलिक्स की रिपोर्ट की मानें तो नेता, बड़े उघोगपति और नौकरशाहों की तिकड़ी की ही ब्लैक मनी दुनिया के बैंकों में जमा है इसके अलावा सिनेमा के धंधे से लेकर सैक्स ट्रेड वर्कर और खेल के धंधेबाजों से लेकर हथियारो के कमीशनखोरो के कालेधन के जमा होने का जिक्र भी होता रहा है।

भ्रष्टाचारियों का ये कालाधन इतना बड़ा है कि अब तो ये भी सवाल उठ रहा है कि अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाकर ज्यादा लूटा या आजाद हिंदुस्तान के पैरोकार होने का दावा करने वाले नेताओं ने देश को ज्यादा लूटा....आजाद हवा में सांस तो हम ले रहे हैं कि आज भी वो पैसा जो 36 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का उत्थार कर सकता था कालेधन के रूप में कहीं छुपा किसी भ्रष्टाचारी के काले गुनाहों को पर्दे में डाले हुए हैं....

ये सच है कि देश में आज भी 6 करोड़ रजिस्टर्ड बेरोजगार है... किसान मुसीबतों में जी रहे हैं सिंचाई सिर्फ 23 फीसदी खेती की जमीन तक पहुंच पायी है... उच्च शिक्षा महज साढे चार फिसदी को ही नसीब हो पाती है और हेल्थ सर्विस यानी अस्पताल महज 12 फीसदी तक ही पहुंचा....किस भारत में गर्व करें हम वो जो दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था है या फिर वो जो एक तरफ लूट की इक्नामी में अव्वल हैं और दूसरा गरीबी भुखमरी में देश के दूसरे देशों से बदतर हालत में है

नोटबंदी से क्या कम हुआ कालाधन और भ्रष्टाचार ?

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है अपने देश की....दुनिया में हमें युवा अर्थव्यवस्था माना जाता है क्योंकि यहां भविष्य की उड़ान दिखती है जो विकासशील से विकसित अर्थव्यवस्था बनने को बेताब है... पर ये दौर ईमानदारी का नहीं भ्रष्टाचार की जड़े इतनी मजबूत है कि कोई इससे अछूता नहीं है.. भ्रष्टाचार ही कालेधन को जन्म देता है... देखा जाये तो कालाधन वो है जो अवैध तरीके से अर्जित किया जाये... इसे उन गैरकानूनी स्त्रोतों से इकट्ठा किया जाता है जिन पर सरकार की नजर न पड़े... कालाधन वो भी है जिस पर टैक्स नहीं दिया जाता... हम सब ये जानते हैं कि कालाधन के आका इस पैसे को देश ही नहीं विदेशों में चोरी छुपे रखते हैं चोरी से जमा अरबों रूपये विदेशी बैंकों में जमा हैं कालेधन की मौजूदगी भारतीय अर्थव्यवस्था में कितनी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2008 में जब दुनिया मंदी से जूझ रही थी तो इसका असर भारत में नहीं था... तब ये कहा गया कि ऐसा नकद या कालेधन पर आधारित पेरेलर इकॉनोमी की वजह से हो रहा है.... कालेधन का यूं तो सही आंकड़ा किसी को नहीं पता... सरकार के पास भी इसका कोई आंकड़ा नहीं है इसके साथ ही अचल संपति के नाम पर भी करोड़ों का हेर फेर किया जाता है बिना टैक्स चुकाये सरकार को प्रोपर्टी मार्किट ने भी करोड़ों का चूना लगाया है.... कई बार ये सवाल उठा भारतीयों का कितना काला धन विदेशों में है? हकीकत में सच्चाई कोई नहीं जानता... लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि हिंदुस्तान में कालाधन क्यों बनता है? इसके लिये सिस्टम को जिम्मेदार माना जाये जो गलत नहीं होगा.... सिस्टम के लूपहॉल का फायदा घूसखोर उठाते हैं नेताओं से लेकर सरकारी अधिकारी तक लोगों की मजबूरियों का फायदा उठाकर मोटी रकम एंठने का काम करते हैं नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये पैसा चाहिए तो टिकट की खरीद फरोख्त तक होती है... नेता जनता को उनके काम कराने का लालच देते हैं तो मोटा चंदा उनके पार्टी फंड में आता हैं... वहीं रिश्वत लेकर जल्दी फाइल आगे बढ़ाने का काम सरकारी दफ्तरों में होता है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता... ठेकेदार अपने ठेके के लिये रिश्वत देते हैं तो व्यापारियों भी इस चक्र का हिस्सा बन जाते हैं... एक सिरे से जब कालेधन को बढ़ावा मिलता है तो पूरा सिस्टम कालेधन के जाल में फंसता है मेहनत की कमाई से रिश्वत के पैसे जब जुटाये नहीं जाते तो उंगली टेड़ी कर दूसरे तरीके से पैसे इकट्टा कर मांग पूरी की जाती है... ना चाहते हुए भी भ्रष्टाचार का हिस्सा हर कोई बन जाता है क्योंकि सिस्टम ही भ्रष्ट हो गया है....पारदर्शिता और जवाबदेही सिस्टम में नहीं है और यही कारण है कि भ्रष्टाचार की जड़े इतनी मजबूत है पूरी तरह से इसे निकालना मुश्किल है








MY BOOK : Pyar Mujhse Jo Kiya Tumne

नभ और धारा की ये कहानी दोस्‍ती, प्‍यार और नफरत के बीच के अजीब सफर से गुजरती है। नभ एक आर्मी ऑफिसर है, जो आर्मी में इसलिए गया क्‍योंकि उसे अप...