मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

वो पनाह दोस्ती है पार्ट 38

अंश की बात सुनकर कशिश को उनकी आखिरी मुलाकात याद आ गई वो मुलाकात जिसमें कशिश उस अधूरेपन को खत्‍म करने की बात कह गई थी जो उसे परेशान कर रहा था,,,, पर आज दोनों फिर एक दूसरे के आमने सामने थे। अब ये क्‍या था जो उन्‍हें करीब ला रहा था,,,, बस एक मौका मिला तो दोनों साथ आ गए। कशिश यहीं सोचती रही कि उसने खुद अंश से मिलने से मना किया था पर आज जब अंश सामने है तो क्‍या वो उसे नजरअंदाज कर सकती है? क्‍यों नहीं उसने मना कर दिया कि जो रिश्‍ता सालों पहले उसने खत्‍म कर दिया था वो दोबारा शुरू नहीं करना चाहती।

शाम तक कशिश यही सोचती रही कि आखिर वो खुद क्‍या चाहती है अंश से दूर रहना या उसके पास ?

कुछ सवाल ऐसे होते है जिसे हम खुद से करने से भी डरते है डर इस बात का कि कहीं जवाब सच में मिल गया तो ? दिल की बातें समझना आसान नहीं होता लेकिन कुछ लोग जानकर भी अनजान ही बने रहना चाहते है क्‍योंकि इसी में सबकी भलाई है अंश और कशिश शायद ऐसे ही दो लोग है पास आते हैं तो कोई और दिखाई नहीं देता और जब आस पास के लोग दिखाई देने लगने है तो पास आने से घबराने लगते हैं। दोस्‍ती का ये कौन सा रूप है ये समझना बड़ा मुश्‍किल है दोस्‍त तो बिंदास होते हैं ना,, दोस्‍तों से तो हर बात की जा सकती है उन्‍हें कभी ये कहना नहीं पड़ता कि अब मिल नहीं सकते तो रिश्‍ता खत्‍म करते हैं दोस्‍ती तो हमेशा रहती है चाहे दोस्‍त कही भी रहे।

अंश तो ये बात समझता था पर कशिश शायद कुछ और ही सोच रही थी उसे पता नहीं क्‍यों लग रहा था कि ये इतना मुश्‍किल है उसके लिये,,, खैर शाम भी हो गई और अपनी कशमकश से उलझती कशिश सागर और एकांश के साथ तैयार होकर अंश से मिलने रेस्‍टोरेंट भी पहुंच गई।
सामने अंश और उसका परिवार था,, आकृति और छवि से वो ऐसे घुलमिल गई जैसे बरसों से उन्‍हें जानती हो,, सबने डिनर किया और अब जाने का वक्‍त भी हो रहा था। कशिश जाने लगी तो अंश ने उसे रोक लिया कहा चलो तुम्‍हें कुछ दिखाना है बस दस मिनट लगेंगे। अंश की बात मानकर कशिश रूक गई और बाकी सब चले गये।

इतने साल बाद दोनों फिर साथ थे,, अंश कशि श को देखकर मुस्‍कुरा रहा था ये कशिश के लिये आसान नहीं था वो थोड़ी असहज थी ये देखकर अंश थेाड़ा हैरान हुआ और पूछा,, तुम शर्मा रही हो मुझसे ?

नहीं, ऐसा नहीं है, बहुत धीरे से कशिश ने कहा,,

तो बताओ नहीं मिलना चाहती थी मुझसे कभी,, अंश ने पूछा

ये क्‍यों बोल रहे हो,, अंश कशिश थोड़ा झलकाकर बोली

तो क्‍या कहूं जबसे गई वापस नहीं लौटी,, एक फोन भी नहीं किया,, कोई जरिया ही नहीं छोड़ा कि मैं तुम्‍हें ढूंढ सकू,,,, अंश का लहजा थोड़ा शिकायत वाला था,,,

पर कशिश ने सिर्फ इतना ही कहा कि बोल कर तो गई थी ना अंश नहीं लौटूंगी कभी,,, फिर क्‍यों इंतजार किया,,,,,,,,,,,,

कशिश तुम अपना इंतजार खत्‍म करके गई थी मेरा तो अब भी बाकी है अंश ने जवाब दिया,,,,

मतलब क्‍या? कशिश ने पूछा

मतलब खुद से पूछो,, एक जवाब दो आखिर हमारा रिश्‍ता है क्‍या ? तुम तो चली गई सब खत्‍म करके लेकिन सच बताउ कुछ खत्‍म हुआ नहीं,, तुम्‍हारी याद आज भी है मेरे साथ,,, हर दिन बस यही सोचता रहा कि तुम ऐसे क्‍यों गई,,, तुम्‍हें तो खुश होना चाहिए था,, क्‍यों तुम्‍हें ये लग रहा था कि तुम मेरे और आकृति में बीच में आ रही हो जबकि तुम्‍हीं ने मुझे आकृति से मिलने के लिये राजी किया था,,, क्‍यों कशिश ये सब क्‍यों हुआ,,, इतने साल तुम्‍हारे बिना क्‍यों बिताने पड़े मुझे,, क्‍यों नहीं तुम मेरे साथ थी मेरे बाकी दोस्‍तों की तरह जो दूर है लेकिन उनसे रिश्‍ता खत्‍म नहीं हुआ किसी ने कभी कहा नहीं कि रिश्‍ता खत्‍म करना है तुमने ये क्‍यों कहा

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