बुधवार, 10 अगस्त 2016

तलाश में हूं खुद की....

अपनी तलाश की है कभी,, कभी खुद को ढूंढने निकले हैं,,, फुर्सत के लम्हों में कभी खुद से बात की है,,, कभी जाना क्या चाहता है दिल,,, हालातों में गुम होने पर तन्हाई की रात में खुद से टकराएं हैं कभी,,, कभी चलते चलते यूंही रुक कर पीछे मुड़कर देखा है,,, सोचा कहां छोड़ आये खुद को,,,किस मोड़ पर खुद को खो दिया,, किस मोड़ पर खुद से फिर मिले,, हां, पता है ये सब सोचने का टाइम किसके पास है टाइम हो न हो,, सवाल तो है,, सोच का दायरा छोटा हो,, पर जवाब बड़ा है,,, यूं ही चलते चलते कोई बता जाता है,, यूं ही चलते चलते कोई समझा जाता है,, यूं ही चलते चलते कोई खुद को खुद से मिलवा जाता है,,,

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