शनिवार, 22 मार्च 2014

तलाश में हूं खुद की,,,,, पार्ट 6


काश्वी इस फंक्शन में सबके लिये एक यंग अचीवर थी,,, हर कोई उससे बात करना चाहता था निष्कर्ष दूर से उसे देखता रहा,, पास जाकर बात करने की हिम्मत नहीं हुई,,,,, घर जाते वक्त पापा ने काश्वी से पूछा एक महीने की वर्कशॉप,,,,, कब से जाना है??

दो दिन बाद रजिस्ट्रेशन कराने जाना है फिर पता चलेगा पूरा शेड्यूल,,, काश्वी ने जवाब दिया,,

घर पहुंचकर काश्वी कुछ खुश लग रही थी,,, कुछ देर पापा से बात की और फिर सो गई,,,

दो दिन बाद रजिस्ट्रेशन के लिये अपने सभी डॉक्यूमेंटस लेकर निष्कर्ष के ऑफिस पहुंची काश्वी,,, उसी की कंपनी ने ये वर्कशॉप कराई है,, रिस्पेशन पर पहुंचकर काश्वी ने पूरा प्रोसिजर पूछा तो रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने उसे निष्कर्ष के रुम में भेज दिया,,,
दरवाजे पर नॉक किया तो अंदर से 'कम इन' की आवाज आई,,,, सामने वाली कुर्सी पर निष्कर्ष था,,, काश्वी बहुत सहज तरीके से उससे बात करने की कोशिश कर रही थी,,,,, निष्कर्ष ने भी मुस्कुरा कर काश्वी से सारी बात की,, उसे पूरा प्रोग्राम डिटेल में बताया,,,

काम पूरा करके काश्वी जाने लगी तो निष्कर्ष ने उसे पीछे से रोका,,,

काश्वी,,, आई एम सॉरी,,, निष्कर्ष ने कहा

काश्वी ने हैरानी से पीछे मुड़कर देखा,,, इसी से बचना चाहती थी वो,,, और फिर उसी सिचुएशन में खड़ी थी,, उसे कुछ समझ नहीं आया कि वो क्या कहे,, बस निष्कर्ष से पूछा,,, सॉरी क्यों?

उस दिन आपकी फोटोग्राफ्स देखकर मैंने जो कहा,, आपको बुरा लगा होगा शायद,, इसलिये सॉरी,, प्लीज आपको हर्ट करने का मेरा इरादा नहीं था,, निष्कर्ष ये सब बहुत हिम्मत करके कह पाया था,, सॉरी बोलना आसान नहीं होता,, खासकर तब जब आपको पता न हो कि सामने वाला कैसे रिएक्ट करेगा,,, पर निष्कर्ष की तरह हिम्मत करके सॉरी बोल देना चाहिए,, मन का बोझ हल्का हो जाता है,,, रिश्ते बेहतर होते है,, खैर निष्कर्ष ने तो अपना काम कर दिया अब जवाब काश्वी को देना था

काश्वी ने बस इतना ही कहा कि,, कोई बात नहीं आप को जो लगा आपने कहा,, मुझे बुरा नहीं लगा,, प्लीज आप मेरी वजह से परेशान न हो,, ये कहकर काश्वी वहां से चली गई,,,,,

निष्कर्ष अब भी कुछ सोच रहा था,, उसे लगा कि बात तो है कुछ लेकिन काश्वी ने उसे बताया नहीं,,,,,,

दो दिन के बाद काश्वी को वर्कशॉप के लिये निकलना था ये वर्कशॉप हिमाचल के एक छोटे से हिल स्टेशन पर थी जहां निष्कर्ष के पापा फेमस फोटोग्राफर उत्कर्ष राय का फोटोग्राफी स्कूल था,,,

अपना बैग पैक कर रही थी काश्वी,, अपने कैमरे की बैटरी, हार्ड डिस्क,, अपना लैप टॉप,, आई पॉड सब सामान रख लिया था,,, पापा, मम्मी, दीदी सब उसके लिये सामान ला रहे थे,, ये पहली बार था जब वो अकेली जा रही थी वो भी एक महीने के लिये,,,,

सुबह पांच बजे काश्वी को निकलना था,, सुबह सुबह तैयार होकर काश्वी पापा को जल्दी चलने के लिये बुला रही थी,,, चलो,, मैं लेट हो जाउंगी,, काश्वी की आवाज पूरे घर में गूंज रही थी,,,

मम्मी उससे पूछे जा रही थी सब सामान ले लिया,, और कुछ चाहिए तो नहीं,,,

काश्वी ने सबको बाय कहा और चल पड़ी अपने सपनो की उड़ान भरने,,, फोटोग्राफी उसकी जिंदगी थी और सीखने की चाहत ही उसे यहां तक ले आई थी,, अब तक वो शौक के तौर पर अपने कैमरे से तस्वीरें खींचती थी पर अब उसे प्रोफेशनल ट्रेनिंग मिलने वाली थी,, वो इसे लेकर काफी एक्साइटेड थी,,

बस आधे घंटे में वो उस बस में सवार थी जिसमें उसी की तरह दस और ट्रेनी थे,, आगे से तीसरी विंडो सीट के उपर बने रैक पर काश्वी अपना सामान एडजस्ट कर रही थी,, तभी बस में आवाज सुनाई दी,,
वेलकम ऑल,, आप सबका स्वागत है,, यहां से आपकी एक नई शुरुआत होगी,, उम्मीद है आप का ये सफर आपको नई मंजिलों तक ले जाए,,, रास्ते में कोई प्रोब्लम हो तो मैं और हमारा पूरा क्रू आपके साथ रहेगा,,,
ये आवाज निष्कर्ष की थी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बस चलनी शुरु हुई और सब एक दूसरे को जानने की कोशिश करने लगे,, इंट्रोक्शन हुआ और फिर बात शुरु हो गई पर काश्वी कुछ झिझक रही थी वो इतनी जल्दी किसी से घुल मिल नहीं पाती थी,, किसी को जानने और पहचानने में उसे थोड़ा वक्त लगता था फिर दोस्ती करना तो बहुत दूर था,,, अपने कानों में हेडफोन लगाए वो खिड़की से बाहर देखती रही,,, सुबह की हल्की हल्की धुंध में दिल्ली से बाहर निकलते हुए हाईवे का सफर बहुत सुकून देता है बस वही देखती रही,,, वो बाहर देख रही थी लेकिन निष्कर्ष का ध्यान उसी पर था,,, कुछ अलग लगी निष्कर्ष को काश्वी,,, शायद कुछ स्पेशल भी,,,,,,,,

ये शायद इंसानी फितरत होती है जो बोलता है उसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं जाता लेकिन जो चुप होता है उसकी चुप्पी की पीछे के रहस्य को जानने के लिये उत्सुकता जरुर होती है,,, दस एक ही उम्र के लोग लेकिन सबकी पर्सनेल्टी अलग,,,,, कोई ज्यादा बोलता है तो कोई कम,,,,,, कोई एकदम बिंदास तो कोई बहुत शाय,,, पर यहां एक लड़की थी जिस पर निष्कर्ष का ध्यान था,,, पूरे रास्ते निष्कर्ष काश्वी को ही नोट कर रहा था,,,

और काश्वी सोच रही थी कि वो जगह कैसी होगी जहां वो जा रही है,, क्या उसे वहां उस सवाल का जवाब मिल पाएगा जो उसके दिल दिमाग पर छाया हुआ है,,, क्या उत्कर्ष राय जैसे फेमस और एक्सपियरियंस फोटोग्राफर से सीख कर उसकी तस्वीरों में जिंदगी की झलक आ पाएगी?

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