पंजाब
और गोवा की हार आम आदमी पार्टी
भले ही पचाने की कोशिश कर रही
हो लेकिन आप से जुड़े कार्यकर्ताओं
की बगावत बता रही है कि ये हार
अभी और घातक साबित होगी आम
आदमी पार्टी के लिये...
एमसीडी
चुनाव से पहले बड़ी संख्या
में उठापटक ये सवाल भी खड़ा
कर रही है कि क्या आप से मोहभंग
होने लगा है...
बस
दो साल ही हुए है दिल्ली में
आम आदमी पार्टी की सरकार बने...
बस
दो साल ही हुए है आम आदमी पार्टी
को ऐतिहासिक जीत मिले हुए...
दो
साल में ही क्या ब्रांड केजरीवाल
अपनी कीमत खो रहा है...
क्या
केजरीवाल के नाम पर मिली दिल्ली
की 67
सीटों
वाली जीत के मायने अब बदलने
लगे हैं....
क्या
पंजाब और गोवा की हार से
कार्यकर्ताओं की आप से उम्मीदें
धराशायी हो रही हैंक्या मोहभंग हो रहा है आम आदमी पार्टी से ?
अरविंद केजरीवाल के नाम के साथ खड़ी हुई पार्टी कुछ ही सालों में एक लंबे दौर से गुजर चुकी हैं इस पार्टी के नाम में 'आम' शब्द जरूर है लेकिन इसमें जो कुछ अब तक हुआ है वो 'आम' नहीं लगता....आप को शुरू करने वाले कई लोग थे लेकिन ये पार्टी एक नाम के सहारे आगे बढ़ी...सबकुछ छोड़ एक ब्रांड बनाया अरविंद केजरीवाल को.... उन्हीं के नाम पर चार चुनाव लड़े और चुनाव के पहले और बाद में कई उठा पटक झेली... आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार से छुटकारा दिलाने और राजनीतिक पारदर्शिता लाने के वादों के साथ राजनीति में आयी थी लेकिन ये पारदर्शिता पार्टी में है या नहीं इस पर लगातार बहस होती रही... आम आदमी पार्टी को खड़ा करने में कभी अपना जी जान लगा देने वाले केजरीवाल के पुराने साथी भी नाराज होकर पार्टी से अलग हो गये। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, शाजिया इल्मी, कैप्टन गोपीनाथ, अश्विनी उपाध्याय, मधु भादुड़ी, विनोद कुमार बिन्नी और प्रोफेसर आनंद कुमार जैसे लोगों का भी केजरीवाल से मोहभंग हो गया और वो पार्टी पर आरोपों की बौछार कर अलग रास्ते चल दिये।
आरोप लगा कि पार्टी राह से भटक चुकी है और इसके नेताओं पर व्यक्तिवाद हावी हो रहा है. सत्ता के खिलाफ लड़ाई में देश से भ्रष्टाचार मिटाने का दंभ भरने वाली आम आदमी पार्टी पर इंटरनल डेमोक्रेसी न होने का आरोप लगा....
जो अलग हुए उन्हें पीछे छोड़ आप आगे तो बढ़ गई लेकिन उनके लगाए आरोपों ने आप का पीछा नहीं छोड़ा... दिल्ली की सत्ता तो आसानी से हाथ लगी आप के... ऐसा मैनडेट मिला कि फिर दोबारा सोचने की जरूरत नहीं पड़ी आप को... लेकिन इसका फायदा भी नुकसान में बदलता नजर आ रहा है दो साल में ही आप की कैबिनेट के कुछ नेता जेल का मुंह देख चुके हैं। कई नेताओं के खिलाफ जांच भी चल रही है। काम हुए तो केजरीवाल ने किए और न हुए तो मोदी ने करने नहीं दिए ये बात आप ने कह तो दी लेकिन इस पर भरोसा कितने लोगों ने किया इसका सही आंकलन शायद आप नहीं कर पाई...
दिल्ली के भरोसे पंजाब और गोवा में जीत के सपने देखने वाली आप के कुछ फैसले गलत साबित हुए... एक वक्त था जब पंजाब में विरोधी दल भी मानते थे कि अगले चुनाव में आप उन्हें बड़ी चुनौती दे सकती है. लेकिन इसके बाद से हुए घटनाक्रम ने संभावित चुनौती को बड़ी तेजी से कमजोर कर दिया... पंजाब और गोवा में मिली हार को सिर्फ आप की हार नहीं कहा सकता ये हार उस उस चेहरे की हार भी है जिसके भरोसे आम आदमी पार्टी दिल्ली से बाहर अपनी जड़ें फैलाने की उम्मीद लगाए बैठी थी. पंजाब की हार का पोस्टमार्टम करें तो यहां भी आप से मोहभंग के संकेत बहुत पहले से मिलने शुरु हो गये थे जिसे आप ने लगातार नजरअंदाज किये... 100 सीटें जीतने का दावा करने वाली आप पर आरोप लगा कि उसने स्थानीय नेताओं की अनदेखी की... सांसद धर्मवीर गांधी और हरिंदर सिंह खालसा को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में निलंबित किया गया. हरिंदर सिंह खालसा ने भी तब इस कार्रवाई के लिए पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगी संजय सिंह की तानाशाही को जिम्मेदार ठहराया था.
चुनाव प्रचार के दौरान भी कई गातिविधियां आप के खिलाफ नतीजों के रुप में सामने आई...टिकट बेचने तक के आरोप आम आदमी पार्टी पर आप के अपनो ने ही लगाए...हर विवाद के साथ आप के बागियों की लिस्ट बढ़ती जा रही है... कर्नल देवेंद्र सहरावत और पंकज पुष्कर जैसे विधायक दिल्ली में आप के खिलाफ बहुत पहले से बागवत का झंडा बुलंद किए हुए हैं...
हार की समीक्षा करने में लगी आप के सामने एमसीडी की जंग लड़ने की तैयारी करने का वक्त है लेकिन इस समय कार्यकर्ताओं के पार्टी छोड़ने की खबरें पार्टी के भविष्य पर भारी पड़ सकती है... आप के सामने ये भी बड़ा सवाल है कि अगर मोहभंग होने का सिलसिला जारी है तो क्यों? क्या एक जैसे आरोपों में वाकई सच्चाई है? क्या आप में सबकुछ उपर के नेता ही तय करते हैं? खैर अंदरुनी मसलों से निपटने के साथ एमसीडी चुनावों को लेकर भी आप को अपनी रणनीति बदलनी होगी क्योंकि यहां अच्छा प्रदर्शन किसी और पार्टी से ज्यादा ये आप के अस्तित्व को बचाये रखने के लिये जरूरी है ये चुनाव दिखाएंगे कि सिर्फ बागी नेताओं और कार्यकर्ताओं का ही मोहभंग आप से हुआ है या फिर दिल्ली की जनता का भी....