बुधवार, 13 जून 2018

छल, कपट, धरना, अनशन राजनीति की मारी दिल्‍ली बेचारी!

 
कोई दिखता नहीं ऐसा जो वाकई दिल्‍ली के बारे में सोच रहा हो. अपनी राजनीति के लालच से आंखें बंद किए सब  बस कुर्सी पाने के पैंतरे चल रहे हैं. एलजी हाउस के अंदर बैठी केजरीवाल केबिनेट दिल्‍ली के भविष्‍य के लिये भूख प्‍यास से लड़ है या फिर अपने अस्‍तित्‍व को बचाने का आखिरी दांव चल रही है?  बात धरने की है तो उस पर से तो दिल्‍ली क्‍या शायद देश के बाकी हिस्‍सों के लोगों का भरोसा बहुत पहले ही उठ चुका है. किसी का भूखा प्‍यासा रहना या रहने का दावा करना अब किसी को परेशान नहीं करता. कोई अपने घरों में बैठकर टीवी पर धरने और अनशन की बात सुनकर जरा भी भावुक नहीं होता और फिर दिल्‍ली की परेशानियां भी तो नई नहीं है वो तो हमेशा से रही है और आगे भी रहेंगी सब जानते हैं कुछ नहीं बदलेगा.

बदलने के लिये जिसे दिल्‍ली ने चुना वो तो खुद बदले बदले दिखाई दे रहे हैं, कभी काल बनकर गरजने की बातें करने वाले आज निढाल होकर सोफे पर पड़े हैं, कहते हैं कोई काम करने नहीं दे रहा,,,

काम करने देने का वादा क्‍या कभी केजरीवाल से किया था किसी ने?

क्‍या मोदी जी की सरकार ने उन्‍हें कहीं लिखकर दिया था कि वो उन्‍हें हर वो चीज मुहैया कराएंगे जिससे वो दिल्‍ली को पेरिस बना दे?

क्‍या पूर्व सीएम शीला दीक्षित ने कोई रियासत छोड़ी थी केजरीवाल के लिये जहां उन्‍हें राजसी ठाठ बाठ मिलेंगे नौकर चाकर आगे पीछे घूमेंगे और उनके मुंह से शब्‍द निकलने के पहले ही सारे काम हो जाएंगे?

भ्रष्‍टाचार से लड़ने के लिये नई राजनीति करने के लिये तो आए थे केजरीवाल अपनी आम आदमी पार्टी लेकर फिर आज तीन दिन से एलजी के छोटे से वेटिंग रूम में क्‍यों बंद है?

किससे बचने की कोशिश में हैं आप? काम ना कर पाने की जवाबदेही से या फिर खुद को लाचार दिखाकर काम ना कर पाने का बहाना ढूंढ रहे हैं?

सिर्फ राजनीति ही क्‍यों किसी भी फील्‍ड में देखिये कोई किसी को काम नहीं करने देना चाहता,,, दूसरा ज्‍यादा काम करेगा तो सबको करना पड़ेगा ये मानसिकता तो हर जगह है लेकिन लोग लड़ते हैं आगे बढ़ते हैं क्‍योंकि इसके अलावा कोई चारा नहीं होता

सीएम बनने के बाद भी लाचारी का दामन थाम कर वोट का जुगाड़ करने की अगर सोच आप के अंदर फिर से पनप रही है तो शायद इस बार निराशा के अलावा कुछ ना मिले दिल्‍ली के दिल में जो थोड़ी उम्‍मीद आम आदमी पार्टी से बची है शायद वो भी खत्‍म हो जाए,,,, एलजी अनिल बैजल की चुप्‍पी लोग समझ सकते हैं क्‍योंकि इससे ज्‍यादा वो कुछ कर भी नहीं सकते,,,नजीब जंग पर हिटलर होने के आरोप तो पचा गई दिल्‍ली लेकिन हर एलजी हिटलर होगा ये मानना थोड़ा मुश्‍किल है वैसे भी दिल्‍ली को डोर टू डोर सरकारी सेवाओं की उतनी जरूरत नहीं जितनी बिजली पानी, सड़कों की मरम्‍मत, एमएलए फंड का सही इस्‍तेमाल चाहिए ,,,हर दिन डीटीसी की बसों की भीड़ में धक्‍के खाने वाले को दिल्‍ली के पूर्ण राज्‍य बनने से क्‍या हासिल हो जाएगा? नई योजनाओं को शुरू करने की लड़ाई लड़ने से पहले एक बार पुरानी योजनाओं की रिपोर्ट पर नजर डाल ले तो क्‍या ये बेहतर नहीं होगा? जनता से सीधे जुड़कर क्‍यों नहीं विधायक अपने स्‍तर पर उन कामों को करवा रहे जिसके लिये एलजी की परमिशन की जरूरत ही नहीं, मोदी जी गली मोहल्‍लों में विधायकों के काम करवाने में तो शायद अड़ंगा ना लगाये.
आम आदमी पार्टी शायद भूल गई पर दिल्‍ली को तो याद है कि उनकी छोटी छोटी लड़ाईयों को लड़ने के लिये ही केजरीवाल को सत्‍ता सौंपी थी पर अब तो AAP परेशानियां को कम करने की बजाय राजनीति में उलझकर बेचारगी साबित करने पर उतारू नजर आ रही है.   
  



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