शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

न तुम जानो, न हम......



कई साल बीत गये,,, आज बहुत अजीब लग रहा है,,, यहां की हर चीज जैसे रूक सी गई है,, पता नही क्‍यों ऐसा लग रहा है,,, जब छोड़ा था तो सोचा नही था कि यहां वापस आना होगा,,, पर अब आकर नही लगता कि ये वही जगह है,,, चार साल बीत गये और पता भी नही चला। इसी जगह उन्‍हें पहली बार देखा था,, वो दिन था कॉलेज में मेरा पहला दिन,, थोड़ी घबराहट थी,,, थोड़ी एक्‍साइटमेंट और थोड़ा सा डर भी लग रहा था,,, स्‍कूल में तो कभी ऐसा नही लगा,, वहां तो जब से याद है सब अपने ही नजर आते थे,,,पर यहां सब कुछ अलग है,, सब नया,, यहां की दीवारें, फूल कोई मुझे नही पहचानता। पता नही कैसे तीन साल गुजरेंगे,, कौन दोस्‍त बनेगा,, कौन सा प्रोफेसर होगा,,, कैसा होगा,,, कितने सवाल थे उस वक्‍त मन में और उन सब सवालों का जवाब देने वो आये। हाय फ्रैंडस,, वेलकम टू सिटी कॉलेज,, मेरा नाम सिद्धार्थ अग्निहोत्री है मैं आपको इकोनोमिक्‍स पढाउंगा। पहले दिन पढाई की बात नही करेंगे,,, चलो एक दूसरे से पहचान कर लें,,, चलो शुरू हो जाओ नाम बताओ,, हां तुम,,, सबसे नाम पूछा,, जब मेरी बारी आई तो मैंने भी डरते डरते बोला,, जिया सक्‍सेना,, उस वक्‍त की हर बात अब तक याद है पता नही क्‍या हुआ था पर वो आंखे कभी भूल नही सकती। दिन बीतते गए क्‍लासेस शुरू हुई, सब ठीक चल रहा था एक दिन अचानक पता चला कि आज तो इकॉनोमिक्‍स की क्‍लास नही होगी,, क्‍योंकि सर छुट़टी पर है,,,,तो क्‍या हुआ हर कोई बिमार पड़ता है नही है तो क्‍यों इतना खाली लग रहा है क्‍यों लग रहा है कि उन्‍हें आस पास ही होना चाहिए,,,, खैर उस फीलिंग को उस वक्‍त समझ पाना शायद संभव नही था पर आज वो सब समझ आ रहा है क्‍यों कोई अचानक इतना अच्‍छा लगने लगे कि उसकी मौजूदगी आपको पूरा करें और वो न हो तो सब अधूरा लगे। उस वक्‍त यही तो हुआ था,,, दिन जैसे बीत रहे थे उनसे लगाव बढ रहा था पर बात तो अब भी नही हुई थी कैसे करती वो टीचर थे और मैं स्‍टूडेंट,,, कोई मेल नही था,,,, कोई लिंक नही था,,,, कुछ हो भी नही सकता था,,, पर पता नही क्‍यों आज भी वो आंखे याद है कभी तो लगता था कि उनमें भी वो एहसास है और कभी लगता था कि नही ऐसा कुछ भी नही है वो तो बस अपनी दुनिया में गुम है,,, पर ऐसा क्‍यों होता था कि जब भी कुछ समझाना होता था तो वो क्‍लास में सिर्फ मुझे देखकर ही बोलते थे,, नहीं जानती,, जानने की कभी कोशिश भी नही की। एक साल बीत गया था इसी तरह कभी टीचर स्‍टूडेंट के रिष्‍ते से परे बात ही नही की हमने। न उन्‍होंने कुछ कहा और न ही मैंने,,, बस एक एहसास था कि शायद ये वही है जिसकी तलाश थी पर ये नही पता था कि उन्‍हें भी ऐसा लगता है या नहीं। पर,, उस दिन क्‍या हुआ था जब कॉलेज के बाहर में घर जाने के लिए बस का इंतजार कर रही थी अचानक अंदर से एक कार निकली,,, मेरे आगे रूक गई,, हॉर्न बजा और जब देखा तो सिद्धार्थ सर ही थे। ओह गॉड,, क्‍या करना है कुछ समझ नही आया,, इतने में सर ने कहा, जिया कहां रहती हो मैं छोड़ देता हूं,, धूप बहुत तेज है,, मैंने मना किया पर उन्‍होंने कहा,,, कोई फोरमेलिटी मत करो मैं छोड़ देता हूं,, मना नही किया गया तो मैं गाड़ी में बैठ गई,,, उस दिन पहली बार हम इतना करीब थे,, दिल की धड़कन तक सुनाई दे रही थी डर था कि उनके कानों तक भी आवाज न पहुंच जाये,, वैसे उधर भी शायद हाल कुछ ऐसा ही था,, पांच मिनट हो गये कुछ बोला ही नही,,, पूछा भी नही कि जाना कहां है,,, मैं सोच रही थी कि क्‍या बोलू तभी उन्‍होंने पूछ लिया कहां रहती हो तुम,, मैने बता दिया ठीक है,,, उन्‍होंने कहा, थोड़ा रास्‍ता बता देना मुझे उस एरिया का पता नही, ठीक है,, रास्‍ते में एक जगह गाड़ी रोक दी,, आइसक्रीम खाओगी,, आज गर्मी ज्‍यादा है,, मैंने कोई जवाब नही दिया,,, उन्‍होंने शायद हां ही समझा तभी तो गाड़ी रोक दी,, वो पहली बार थी जब हम एक दूसरे को जान पायें। आइसक्रीम खाते हुए कई बातें हुई,, और ऐसा बिलकुल नही लग रहा था कि ये हमारी पहली मुलाकात थी,,,,,,                    

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