अपने
देश में चुनाव सिर्फ चुनाव
नहीं होता ये जश्न होता है
लोकतंत्र का...
पर
इस बार ये चुनाव काफी अलग है
पांच राज्यों में राजनीतिक
समीकरण चुनावों के बाद बदलने
तय हैं पंजाब उत्तरप्रदेश,
उत्तराखंड,
मणिपुर
और गोवा में किसका राजनीतिक
आधार खिसक रहा है और कौन वापसी
कर जनआधार जुटा रहा है ये सब
तय किया है जनता ने वोट करके.
चुनाव
प्रचार के लिहाज सबसे धुआंधार
चुनाव उत्तरप्रदेश का रहा...
सपा
में अंदरुनी घमासान से लेकर
कांग्रेस से गठबंधन के दांव
तक यूपी में घटता बढ़ता वोट
बैंक साफ दिख रहा है पार्टियों
का...
क्या
राहुल अखिलेश का साथ पंसद आया
यूपी को या फिर आखिरी चरण तक
आते आते देश के पीएम,
18 केंद्रीय
मंत्रियों और 50
सांसदों
के साथ पूरे अमले की तैनाती
डाल गई चुनाव पर असर...क्या
साल 2012
के
विधानसभा और 2014
के
लोकसभा चुनाव के मुकाबले क्या
जातिगत वाटबैंक में हलचल दर्ज
हुई है?
यूपी
का ये चुनाव प्रचार से ज्यादा
नेताओं की असलियत को उजागर
करने वाला लग रहा है मुस्लिम
वोट बैंक का झुकाव किस ओर है
ये यूपी में अहम है तो पंजाब
की अपनी अलग जमीनी हकीकत है...
केजरीवाल
की धमक ने पंजाब का रण दिलचस्प
बनाया जिसके बाद कांग्रेस को
भी एहसास हुआ कि अब करो या मरो
की स्थिति आ गई है पूरी ताकत
लगाते नेताओं की रैलियों में
भीड़ जुटाने का काम तो खूब हुआ
लेकिन पंजाब में बादल छट रहे
हैं या वोटों का समीकरण कुछ
और कहानी कह रहा है ये समझने
का दौर जारी है...
यहां
वोटिंग के आखिरी दिन तक हुए
घटनाक्रम ने पंजाब की राजनीति
को सालों से देखने वालों को
भी सोच में डाल दिया है
बात
उत्तराखंड की करें तो यहां
कांग्रेस को आगे बढ़ाने की
राह में हरीश रावत स्टिंग का
तूफान झेलने के बाद भी जलवा
बरकरार रख पाए हैं या नहीं ये
फैसला होगा...
विजय
बहुगुणा के साथ नौ बागियों
की कांग्रेस से बीजेपी तक की
उड़ान कामयाब होगी या फिर छोटे
दल और निर्दलीय बनेंगे किंगमेकर
इसका खुलासा भी होगा
गोवा
और मणिपुर भी राजनीतिक चाल
की दिशा निर्धारित करेंगे ये
तय है गोवा में आप का परचम
लहराएगा या फाइट मुश्किल होगी
इस पर बहस जारी है...
सवाल
तो ये है कि प्रचार की ताकत
क्या वोट की ताकत बन पाएगी...
कौन
है सबसे काबिल इसका जवाब अभी
मिलना बाकी है...