दिल्ली
के मुख्यमंत्री दिल्ली में
नहीं है.. आजकल
पंजाब में नया आशियाना तलाश
रहे हैं... पंजाब
चुनाव तक वही जो रहना है अरविंद
केजरीवाल को...
विशेष सत्र
बुलाकर दिल्ली सरकार कई मुद्दों
को विधानसभा में उठाने की बात
कर रही है लेकिन मुख्यमंत्री
व्यस्त है क्योंकि अब पंजाब
की अहमियत दिल्ली से ज्यादा
हो गई है...
पंजाब
अब नया ठिकाना है दिल्ली के
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल
का. चुनाव
तक वहीं रहेंगे केजरीवाल...
बीच बीच
में दिल्ली आना जाना लगा
रहेगा...जैसे
कोई मेहमान आता जाता रहता
है.... सही
भी है चुनाव तो पंजाब में ही
होने हैं दिल्ली में वैसे भी
मुख्यमंत्री के पास कोई मंत्रालय
नहीं है... हाईकोर्ट
कह चुका है कि दिल्ली के प्रशासक
उपराज्यपाल नजीब जंग हैं..
सरकार और
एलजी की जंग से भी छुटकारा
मिलेगा...तू
तू मैं मैं नहीं होगी तो शांति
भी बनी रहेगी...वैसे
भी अब निशाना बदल गया है दिल्ली
जीतने के बाद पंजाब की बादल
सरकार अगला टारगेट हैं आम आदमी
पार्टी का...तभी
तो विशेष सत्र से ही गायब है
मुख्यमंत्री..
विशेष सत्र
की अहमियत क्या है और क्यों
सरकार ने इसे बुलाया...
जब सीएम ही
दिल्ली में नहीं...
इस पर करेंगे
बात लेकिन उससे पहले कुछ साल
पहले के केजरीवाल पर बात करते
हैं रह रह कर वो केजरीवाल याद
आते हैं जो वाराणसी चुनाव के
बाद कहते थे कि गलती हो गई
दिल्ली ही उनका घर है
अपनी
गलती से सबक लेकर दिल्ली पर
फोकस करने की बात केजरीवाल
ने फिर दोहराई और 2014
में हुए
हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा
के चुनाव न लड़ने का फैसला आप
ने किया था
चलिये
हरियाणा और महाराष्ट्र की
राजनीति में न पड़ने का फैसला
सही भी साबित हुआ...
दिल्ली में
सरकार बनाकर आप ने इतिहास के
पन्नों में अपना नाम दर्ज
कराया... बात
तो तब भी उठी कि दिल्ली में जो
हुआ वो पूरे देश में दोहराएंगे...
लेकिन
केजरीवाल ने दूसरी बार शपथ
लेते हुए इसे पूरी तरह से
नकारा... अपने
नेताओं को अंहकार से बचने की
सलाह भी दी थी केजरीवाल ने
अपनी
सलाह क्या अब खुद भूल गये हैं
केजरीवाल या पार्टी को अब लगने
लगा है कि डेढ साल में ही दिल्ली
के सारे काम पूरे हो गये अब
पंजाब को संवारने की बारी
है... मुद्दे
तो छोड़िए केजरीवाल के पंजाब
में खूंटा गाड़ने के बयान के
बाद उन पर ये आरोप भी लग रहे
हैं कि विस्तार करने की मंशा
के चलते ही कोई मंत्रालय अपने
लिये नहीं रखा केजरीवाल ने
ताकि दूसरे राज्यों में पार्टी
की कमान आसानी से चुनाव के समय
संभाल सके... बाकी
सब तो ठीक है लेकिन विधानसभा
का विशेष सत्र बुलाकर मुख्यमंत्री
का उसमें शामिल न होना समझ से
परे है... एक
दिन के विशेष सत्र की ही बात
नहीं पिछले सत्र में भी केजरीवाल
आखिरी दिन ही कुछ घंटों के
लिये शामिल हुए थे...
सरकार के
काम और विधानसभा की गरिमा
दोनों के लिये सरकार का होना
जरूरी है और सरकार के मुखिया
मुख्यमंत्री ही अगर दूसरे
राज्य में अपनी पार्टी के
प्रचार को ज्यादा अहमियत देंगे
तो उस पर सवाल विपक्ष में करेगा
और जवाब जनता भी मांगेगी...