फिर मिलेंगे ????
किस्मत से लड़ना सबके लिए संभव नहीं
होता,, और फिर जब पता हो कि लड़ने का कोई फायदा नहीं तो कोशिश करना बेकार होता है
मैंने भी समझ लिया था कि शायद यही होना था,, लंदन जाने का दिन भी आ गया,, सबकुछ
छोड़ कर जाना इतना भी आसान नहीं होता पर जब जाना ही हो तो क्या करें,, सबकी खुशी
में अपनी खुशी ढूंढ कर चली गई,, ये भी नहीं सोचा कि वहां से वापस कभी आना भी होगा
या नहीं,,, लंदन पहुंच गये,, एक नई जगह,, एक नई जिंदगी राह देख रही थी पर क्या
पुरानी यादें भुलानी होगी ?,, ऐसी कोशिश करने के बारे में सोचकर भी डर लगता था जानती
थी ऐसा कर नहीं सकती,, तो सोचा सबको अपनी वजह से परेशान करने की जगह यादों को संजो
कर रखो,,, उस समय को याद कर खुश होया जाए,, कुछ दिन पहले कहीं सुना था,, याद कुछ इस तरह रखो कि जीने के काम आ सकूं,,,, ये
लाइन अब जैसे मेरी जिंदगी बन गई है मैनें सोच लिया था कि सिद्धार्थ अग्निहोत्री ये
नाम हमेशा मेरी यादों में ताजा रहेगा मैं चाहे कहीं भी रहूं कुछ भी करू वो मेरे
साथ होंगे हमेशा क्योंकि अब दूर जाने का कोई सवाल ही नहीं। जिंदगी किसी के होने
या न होने की मोहताज नहीं होती उसका काम तो चलते जाना है अब ये हम पर है कि हम
पीछे छूटने वालों को याद कर दुखी होते है या फिर उनके साथ बिताए अचछे समय को याद
कर खुश रहते है। मेरे सामने पूरी जिंदगी थी सबको मुझसे काफी उम्मीदें थी उनकी
खुशी के लिए लंदन के कॉलेज में एडमिशन ले लिया,,और अच्छे ग्रेडस के साथ पढाई खत्म
की कब तीन साल गुजर गये पता ही नहीं चला। पढाई खत्म कर मैंने नौकरी की तलाश शुरू
कर दी थी लंदन के ही एक कॉलेज में लैक्चरार अपांइट हो गई,,, वहीं करना था जिससे
सब कुछ जुड़ा था,, सिद्धार्थ सर से इंस्पायर होकर मैं भी पढाने लगी,, पता नहीं क्यों
ऐसा हुआ जब मैने पढाना शुरू किया तो स्टाइल वहीं था जो सर का था,, हां,,,, याद है सब,,,, कुछ नहीं भूली,, भूलने की कभी कोशिश ही नहीं की,, क्योंकि याद रखने के पीछे कोई
शर्त नहीं थी,, नहीं चाहती थी कि उनसे कभी फिर मिलू,,,, शायद मैं ऐसे ही खुश थी
क्योंकि इस तरह वो मुझसे कभी अलग नहीं हो सकते थे। कोई कभी कैसे इतना अपना हो
जाता है कुछ पता ही नहीं चलता। ये सब खेल हे ऐसा खेल जहां आप किस लेवल पर किसके
मिलें,, किससे बिछड़े सब उसके हाथ में होता है पर एक बात है कि जब आप ये सोचते हो
कि अब इसके बाद कुछ नहीं होगा,, आप जैसे जहां हो आपको वहीं रहना है,, तभी कहानी
में ऐसा टिवस्ट आता है कि आप सब भूल जाते हो,,, कुछ भी समझे इससे पहले ही समय
अपनी चाल चल जाता है और फिर ऐसी जगह पहुंच जाते हो जहां से आगे की राह दिखाई ही
नहीं देती,, क्या होगा, कैसे होगा किसी को कुछ नहीं पता लेकिन ये पता होता है कि
आपकी जिंदगी अब वैसे नहीं रहेगी जैसे पहले थी। मेरे साथ ऐसा ही हुआ,,, ठीक एक साल काम
करने के बाद यूनिवर्सिटी के डीन ने मुझे बुलाया और कहा आप दिल्ली के सिटी कॉलेज
में पढी है न,, एक मिनट के लिए तो लगा कि सब कुछ ठहर गया जिस बात की आहट से भी मैं
दूर भागती थी उसी का नाम फिर मेरे सामने आ गया था,,, मैंने हां से पहले उनसे पूछा
कि वो ऐसा क्यों पूछ रहे है,, उन्होंने कहा दरअसल यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम होने
वाला है हमारी यूनिवर्सिटी की एक टीम दिल्ली भेजी जा रही है जहां ट्रेनिंग
प्रोग्राम होगा,, इसी के दौरान सिटी कॉलेज भी जाना होगा,,, उन्होंने कहा कि तुम
तो दिल्ली से ही हो तो तुम चली जाओ वैसे भी तुम्हें भी काफी टाइम हो गया होगा,,, वहां गये,,, इस बहाने वहां जाना भी हो जाएगा। ऐसा क्यों होता है जब आप सब कुछ मान
लेते हे अपनी तकदीर समझ कर जिंदगी जी रहे होते है तो एक सवाल खड़ा हो जाता है,,,, मेरे
सामने भी ऐसा ही हो रहा था मुझे कुछ समझ नहीं आया,, मैं चुप रही,,, डीन ने इसे हां
ही समझा और फिर तैयारी शुरू कर दी। दो दिन खूब सोचा कैसे जाउंगी पर इस बार भी सब
बेहद खुश थे मम्मी पापा ने प्लान कर लिया था कि वो मेरे साथ चलेंगे,, उन्हें
अपने लोगों से मिले भी तो चार साल हो गये थे एक बार फिर उनकी खुशी के आगे मै कुछ
नहीं कर सकी,, उनके साथ इंडिया वापस आने का फैसला कर लिया। कॉलेज की टीम को लेकर
पहुंच गई दिल्ली के सिटी कॉलेज। चार साल पहले जो हुआ उसकी यादे साथ लिये हुए सिटी
कॉलेज में इंट्री की,,,, इससे अंजान थी कि आगे क्या होने वाला है,,,,, ये कहानी यहां
खत्म नहीं होती,, यहां से तो इसकी नई शुरूआत हुई है,,, आगे क्या मोड़ आएंगे इसे
सोचने की हिम्मत तो जिया ने कभी की ही नहीं,, वो तो बस अपनी यादों में गुम सिटी
कॉलेज पहुंच गई,,, इस बार उसने ये भी नहीं सोचा था कि वो कैसे सिद्धार्थ
अग्निहोत्री का सामना करेगी।