शनिवार, 29 मार्च 2014

तलाश में हूं खुद की,,,,, पार्ट 7

रास्ता लंबा था,, दिन चढ़ रहा था,,, धीरे धीरे जोश ठंडा हो रहा था,,, बस के लोगों की बातों का सिलसिला अहिस्ता अहिस्ता थम रहा था,, अब बस,, बस के चलने की आवाज और हवा का शोर सुनाई दे रहा था,,, काश्वी का कैमरा उसके हाथ में था,,, हरियाणा के बाद अब पंजाब की सौंध्री खुश्बू आने लगी थी जहां से गुजर कर हिमाचल तक जाना था,, सरसों के पीले खेतों में सर पर पगड़ी बांधते किसान काम करते नजर आ रहे थे,,, कहीं घरों के चूल्हों से निकलता धुआं आसमान की ओर सफेद बादल सा उठता दिख रहा था,,, हाइवे के साथ थोड़ी दूर दौड़ती ट्रेन भी नजर आ रही थी,,, ट्रेन की आवाज सुनने के लिये काश्वी ने अपने हेड फोन निकाल दिए थे,, छुक छुक चलती गाड़ी पंसद थी उसे,,,,,, रास्ते की हर खूबसूरत चीज को काश्वी वहीं रोक कर अपने कैमरे के जरिए फोटो बनाकर साथ ले जा रही थी,,, ये रास्ता उसे याद दिलाएंगी ये तस्वीरें जब भी वो याद करना चाहेगी,,, ये सफर काश्वी के लिये एक अच्छा एक्सपीरियंस होने जा रहा था ये अंदाजा था उसे,, और इससे जुड़ी हर बात को वो रिकॉर्ड में रखना चाहती थी अपनी तस्वीरों के साथ अपने मांइड में हर तस्वीर की व्याख्या कर रही थी वो,, जैसे खुद को समझा रही हो कि वो जो देख रही है कैसे हो रहा है उसके क्या मायने हैं,,, उसके दिमाग का डेटा बेस भर रहा था दिमाग का दायरा बढ़ रहा था,,, अपने शहर की छोटी छोटी गलियों और बड़ी बड़ी इमारतों से अलग उसे यहां छोटे छोटे घर और खुला आसमान दिख रहा था,,,,

हाइवे से गुजरकर जब किसी छोटे से शहर से होकर निकलती थी उसकी बस तो वो ये देखकर हैरान होती कि यहां के लोगों के पहनावा और व्यवहार कैसे अलग है पिछले शहर से,,, दिल्ली में कुछ और हरियाणा में कुछ और पंजाब में कुछ और,,, पहनने,, ओढ़ने का तरीका अलग,,,जीने का तरीका अलग पंरपराएं और मान्यताएं अलग,,, भाषा भी तो एक सी नहीं, जबकि अभी कुछ ही घंटे हुए सफर करते,,,, कुछ किलोमीटर में ही कैसे सब बदल जाता है ये देखकर हैरानी होती है,, इंसान तो वही है पर दिखता अलग,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

कई घंटे हो गये चलते चलते,,,, हाइवे के एक कोने पर छोटे से शॉपिंग आरकेड के बाहर बस रुकी,,, यहां से आगे का रास्ता पहाड़ का था तो वहां रुकना मुश्किल इसलिये लंच और चाय कॉफी के लिये ये होल्ड था,,,

सब बस से नीचे उतर गये,,, और अंदर रेस्टोरेंट की तरफ बढ़ने लगे,,, निष्कर्ष ने सबको बताया कि यहां बस एक घंटे के लिये रुकेगी,,,,,,
सब मस्त थे,, कोई कुछ खा रहा था और कोई बातों में मश्गूल था,,, निष्कर्ष भी सबका ख्याल रख रहा था किसी को कोई प्रोब्लम न हो ये उसकी जिम्मेदारी थी,,, हर टेबल पर जाकर सबसे बात की,,, कुछ देर बाद उसे काश्वी का ख्याल आया,,, पूरे रेस्टोंरेंट में देखा पर वो वहां नहीं थी,,,, कहीं भी नहीं थी,,,, निष्कर्ष ने अपने स्टॉफ से पूछा सब ढूंढने लगे पर किसी को काश्वी दिखाई नहीं दी,,,,

रेस्टोरेंट से बाहर आकर निष्कर्ष काश्वी को ढ़ूढने निकल गया,,, पूरे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में उसे तलाश कर रहा था और वो उस कॉम्प्लेक्स की एक छोटी सी हैंडक्राफ्ट की दुकान में कुछ चीजें देखती मिली,,,

हाथ से बनी चीजों के बारे में काश्वी दुकान में बैठी एक बूढ़ी सी महिला से पूछ रही थी,,, अपने कैमरे से चीजों की तस्वीरें खींचने के साथ वो उसे बनाने का तरीका भी सीख रही थी शायद,,, निष्कर्ष फाइनली काश्वी को ढ़ूढते हुए वहां पहुंचा,,, बाहर से उसे देखता रहा और फिर अंदर जाकर कहा,,, काश्वी,,, आप यहां हैं सब ढूंढ रहे हैं,,,, अकेले क्यों आ गई किसी को साथ ले आना था,,,

काश्वी ने निष्कर्ष की तरफ देखा और कहा,,, वो बस ऐसे ही,,, घूमते- घूमते यहां आ गई,,,

निष्कर्ष मुस्कुरा दिया और कहा,,, आपको कुछ खाना नहीं,, सब वहां लंच कर रहे हैं,,,

नहीं, कुछ नहीं,,,मैं ठीक हूं,,, थैंक्स,,, आप चलो,,मैं बस आती हूं,,, काश्वी ने निष्कर्ष से कहा,,,,

निष्कर्ष को लगा कि काश्वी उसे प्यार से जाने के लिये कह रही है,, अब तो जाना ही पड़ेगा,,, निष्कर्ष वहां से वापस रेस्टोरेंट आ गया,,,,

एक घंटे के बाद सब वापस बस की तरफ जाने लगे,,, निष्कर्ष अब भी काश्वी को ढ़ूंढ रहा था उसे लगा पता नहीं वो कहां है उसने टाइम देखा या अपने कैमरे के साथ ही बिजी है,,,, ये सोचता हुए निष्कर्ष हर तरफ देख रहा था,, बस के पास पहुंचा तो काश्वी वहीं थी,,,

बस का दरवाजा खुला और सब उसमें चढ़ गये,, गाड़ी स्टार्ट हुई और एक बार फिर सफर शुरू हो गया,,, काश्वी अब बस में बैठकर अभी अभी खींची अपनी तस्वीरों को देख रही थी,,, जो उसे पंसद थी उसे सेव कर रही थी और जो नापंसद उसे डीलीट,,,,

अब भी काश्वी की दुनिया में सिर्फ वो,,, उसका कैमरा, कानों में लगा हेडफोन और खिड़की के बाहर गुजरते रास्तों की आती जाती चीजें ही थी,,, बस के बाकी लोग उसके लिये जैसे थे ही नहीं,, पूरे रास्ते काश्वी ने किसी से बात नहीं की,,, पहाड़ी रास्तों से गुजरती बस उपर की तरफ बढ़ रही थी बाहर जो दिख रहा था,, उसे ठीक से देखने से पहले ही बस घूम जाती थी,,, छोटे छोटे मोड़ और पतले लंबे पेड़ों का जंगल,,,साफ हवा में घुली फूलों की खुश्बू और ढलती शाम की हल्की ठंड,,, अपने घोसलों को वापस लौटते पक्षियों का शोर जो शहरों के ट्रेफिक में सुनाई भी नहीं देती,,, यहां बस के शोर के बावजूद साफ साफ सुनाई दे रही है,,, पहाड़ों की चढ़ाई और फिर ढलान वाले रास्तों से गुजरना अपने आप में सुकून सा भरा होता है जो घंटों के सफर की थकान को झट से दूर कर देता है,,,

शाम के छह बजे थे,, मंजिल बस करीब थी,, निष्कर्ष ने सबको बताया कि बस 20 मिनट में हम पहुंचने वाले है,,, जहां से शुरु होगा फोटोग्राफी सीखने का एक नया अंदाज उन सबके लिये जो उस बस में सवार हैं,,,,


MY BOOK : Pyar Mujhse Jo Kiya Tumne

नभ और धारा की ये कहानी दोस्‍ती, प्‍यार और नफरत के बीच के अजीब सफर से गुजरती है। नभ एक आर्मी ऑफिसर है, जो आर्मी में इसलिए गया क्‍योंकि उसे अप...