तलाश
में हूं खुद की
तुझे
पा लूं तो सपनों को छू लूं
तलाश
में हूं खुद की
तुझे
पा लूं तो आसमान को छू लूं
तलाश
में हूं खुद की
तुझे
पा लूं तो जमीन पर ठहर लूं
तलाश
में हूं खुद की
तुझे
पा लूं तो थोड़ा जी लूं
तलाश
में हूं खुद की
तुझे
पा लूं तो खुद को पा लूं
अपनी
तलाश की है कभी,,
कभी
खुद को ढूंढने निकले हैं,,,
फुर्सत
के लम्हों में कभी खुद से बात
की है,,,
कभी
जाना क्या चाहता है दिल,,,
हालातों
में गुम होने पर तन्हाई की रात
में खुद से टकराएं हैं कभी,,,
कभी
चलते चलते यूंही रुक कर पीछे
मुड़कर देखा है,,,
सोचा
कहां छोड़ आये खुद को,,,किस
मोड़ पर खुद को खो दिया,,
किस
मोड़ पर खुद से फिर मिले,,
हां,
पता
है ये सब सोचने का टाइम किसके
पास है टाइम हो न हो,,
सवाल
तो है,,
सोच
का दायरा छोटा हो,,
पर
जवाब बड़ा है,,,
यूं
ही चलते चलते कोई बता जाता
है,,
यूं
ही चलते चलते कोई समझा जाता
है,,
यूं
ही चलते चलते कोई खुद को खुद
से मिलवा जाता है,,,
ये
कहानी भी ऐसी ही है अपने आप को
तलाशने की,,
एक
सफर अपने आप तक पहुंचने का,,,
चलिये
मिलवाते हैं आपको इस कहानी
के किरदारों से
कहानी
शुरु होती है एक स्कूल के
प्रिंसिपल रुम से जहां एक 10
साल
की बच्ची को उसी के पेरेंटस
के सामने प्रिंसिपल डांट रही
है,,,
मिस्टर
कुमार आपकी बेटी इतनी शरारती
है,,,
इसकी
वजह से एक बच्चे का हाथ टूट
गया,,,
इसकी
बदमाशियां कम नहीं हुई तो इसे
स्कूल से निकालना पड़ेगा,,
हम
तो इसे समझा कर थक गये पर डांट
का भी कोई असर नहीं होता,,,
अपनी
जिद के आगे वो किसी की नहीं
सुनती,,,
अब
आप देख लीजिए ये लास्ट वार्निंग
है,,,
प्रिंसिपल
की ये कड़वी बातें और धमकी
सुनकर उस बच्ची के पेरेंटस
बाहर निकले,,
खामोशी
स्कूल के गेट से कार तक साथ
रही,,,
पर
यहां ज्यादा देर तक साथ दे न
सकी,,
काश्वी,
हर
बार तुम्हारी कंप्लेंट आती
है,,
आखिर
प्रोब्लम क्या है क्यों नहीं
तुम सुनती किसी की,,,मम्मी
की डांट को अनसुना कर काश्वी
कार की विंडो से बाहर देखती
रही,,,
काश्वी
की मम्मी जितने गुस्से में
थी,,
पापा
उतने ही खामोश,,,,
उन
पर जैसे कोई असर ही नहीं हो
रहा था
ये
देखकर काश्वी की मम्मी का पारा
और हाई हो रहा था बोल बोल कर
खुद ही चुप हो गई बस इतना कहा
कि काश्वी को बिगाड़ने में
पूरा हाथ उसके पापा का ही है,,,