गुरुवार, 9 जनवरी 2014

वो पनाह दोस्ती है पार्ट 39

कशिश अंश को देखकर मुस्‍कुराई और कहा,, अंश जवाब तुम्‍हारे पास ही है मैं क्‍या कहूं,,, तुम जो समझोगे मैं वहीं हूं और ये रिश्‍ता भी वही है जो तुमने महसूस किया होगा,,,कभी कभी कुछ चीजें बस यूं ही हो जाती है उसके पीछे कुछ वजह नहीं होती,, मुझे भी ऐसा ही लगा था जब हम मिले थे,, सोचा नहीं था कि यहां तक आने के लिये इतना कुछ देखना पड़ा,, तुमसे मिलना फि‍र अलग होना,, फि‍र मिलना,, और फि‍र अलग हो कर अपनी दुनिया में एडजस्‍ट करना थोड़ा मुश्किल था,,, समझ नहीं पा रही थी कि ये सब क्‍या हो रहा है पिछली बार जब मिली तो अंदर एक जंग जैसी चल रही थी कंफ्यूज थी,, जो सवाल तुम अब पूछ रहे हो ये मैं उस वक्‍त खुद से पूछ रही थी कि हमारा क्‍या रिश्‍ता है
 
अंश तुम बताओ रिश्‍ते आखिर होते क्‍या हैं,, किसकी आपकी जिंदगी में क्‍या जगह है क्‍या ये रिश्‍तों की परिभाषा, उनका नाम तय कर सकता है? मां बाप बच्‍चे को जन्‍म देते है पालते है उसकी एक मुस्‍कान के लिये सबकुछ कुर्बान करने को तैयार रहते है लेकिन क्‍या वो उसके सबसे ज्‍यादा करीब होते है क्‍या उसकी भावनाओं को उसकी हर बात को जानते है शायद हां और शायद न,, निर्भर करता है न सिचुएशन पर। कई मां बाप को तो पता ही नहीं होता कि उनका बच्‍चा आखिर सोचता क्‍या है, क्‍या उसकी असली खूबी है

ऐसे ही भाई बहन सब साथ रहते हैं उम्र भर फि‍र भी अनजान रहते है एक दूसरे की पंसद नापंसद से,, कौन सी बात पर कब गुस्‍सा आ जाये क्‍या उन्‍हें अंदाजा रहता है या नहीं,,, ऐसे ही सबसे अच्‍छे दोस्‍त भी एक दूसरे के साथ रहकर कई बार अजनबी से लगते है और कभी कभी अजनबी सबसे अच्‍छे दोस्‍त से ज्‍यादा आपकी बातों को बिना कहे समझ लेते है।

ये बात समझने में कई साल लगे कि तुम मेरे लिये क्‍या हो,, शादी से पहले सागर सबसे अच्‍छा दोस्‍त था उससे हर बात शेयर करती थी लेकिन जब तुम मिले तो लगा कि कुछ तो था जो मेरे पास नहीं था, और तुम्‍हारे आने से पूरा हुआ,,

जब तुमसे बात करनी शुरू की तो अपने आप सब समझने मे आने लगा,, दोस्‍ती करने से नहीं होती, वो बस हो जाती है बात से बात शुरू होती है और बात होती जाती है,, तुमसे भी ऐसे ही जुड़ गई,, कुछ सोचा नहीं था और आगे क्‍या होगा इसका तो ध्‍यान भी नहीं रहा। पर जो कुछ भी इस बीच हुआ उसने सोचने पर मजबूर किया,, शायद कुछ चीजें जितनी दूर रहती है उसकी कशिश उतनी बढ़ती रहती है तुम भी दूर हो रहे थे और मैं तुमसे दूर जाना नहीं चाहती थी,, समझना मुश्किल नहीं था कि ये सब क्‍यों हो रहा है लेकिन क्‍या सिर्फ ये सोचकर कि कुछ सही नहीं है भूला जा सकता है।

तुम्‍हें याद करके तुम्‍हारे लिये आंसू बहाने से अच्‍छा था कि तुम्‍हें ही कह दूं कि मुझे दूर हो जाओ शायद ऐसे थोड़ा आसान हो जाये,,, बस यही सोचा था,,, पर सच बताउ ये सब बातें तब तक ही रहती है जब तक तुम सामने नहीं होते,, सोचती हूं बहुत स्‍ट्रांग हो गई तुम्‍हें बिलकुल भूल गई,, कितना कुछ तो है करने के लिये फि‍र क्‍यों किसी एक चीज को लेकर बैठना,, लेकिन जब सामने होते हो तो समझ आती है कि सब बेकार था जुड़ी तो अब हूं कहीं न कहीं तुमसे, कितनी भी कोशिश करू छूटना आसान नहीं।

कशिश कहती रही और अंश उसे सुनता रहा,,,,,,,


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