शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

न तुम जानो न हम पार्ट 3

दूर होकर भी तुम मेरी यादों में रहना,,,,,,,
उस दिन बहुत रोयी लगा मैं ही क्‍यों,,, क्‍यों नहीं औरों की तरह वहीं मिलता जो चाहिए होता है,,, घर जाने का रास्‍ता भी इतना लंबा लग रहा था,,,, बस लग रहा था कि जल्‍दी घर पहुंचू,, किसी से बात करने का मन नहीं था,, फोन पर फोन आ रहे थे सब पूछ रहे थे कि मैं अचानक कहां गायब हो गई पर शायद ऐसा ही होना था मुझे तो गायब ही होना था,,, वापस आना मुश्‍क‍िल था ये तब पता चला जब घर पहुंच कर पापा ने कहा कि उनका ट्रांसफर लंदन ऑफि‍स हो गया है,, सब खुश थे एक्‍साइटिड थे काफी समय से पापा कोशिश कर रहें थे ट्रांसफर की,, मैंने भी इसके लिए भगवान को काफी मसका लगाया था क्‍योंकि लंदन में पढ़ने का सपना था पर अब समझ नहीं आ रहा क्‍या करूं,, खुश हो या उदास। मैं ही चाहती थी कि दूर चली जाउ  और अब तो लगता है भगवान भी यहीं चाहते है शायद वो भी यहीं चाहते है कि हम फि‍र न मिले,,, एक हफते के अंदर सब करना था हमारी टिकटस, वीजा, लंदन में घर सब फाइनल हो गया था,, अब तक तो मैंने अपनी फ्रेंडस को कुछ बताया नहीं था सिर्फ ये कहा था कि तबीयत खराब है और पैकिंग भी करनी है इसलिए कॉलेज नहीं आ रही,, पर अब तो जाना होगा,,, माइग्रेशन सर्टिफि‍केट लेना है एक बार तो जाना होगा,, पर कदम नहीं उठ रहे,,, दो दिन ऐसे ही गु‍जार दिये,, सोचती रही कैसे सामना करूंगी अब फि‍र सामने आये तो कहीं मेरा चेहरा दिल का हाल बयान न कर दें,,, सोच सोच कर दम निकला जा रहा था और घर में सब पीछे पड़े थे जाओ कॉलेज से सब डॉक्‍यूमेंटस ले आओ लंदन में यूनिवर्सिटी में अप्‍लाई करना है जरूरत पडेंगी,, अब क्‍या बताउ किसी को क्‍यों नहीं जा पा रही,, क्‍या मुश्‍ि‍कल है,, क्‍यों हें ये कशमकश,,, क्‍यों फैसला कर के भी अपने फैसले पर यकीन नहीं हो रहा,, मैंने ही तो पार्टी की उस रात तय किया था कि फि‍र कभी नहीं लौटूंगी,, पर तब तो मैं गुस्‍से में थी,, सोचा नहीं था कि वाकई ऐसा हो जाएगा। वाकई किस्‍मत में वापस लौटना नहीं लिखा। पर अब क्‍या करें,,, करना तो है लंदन जाने से पहले आखिरी बार मैं कॉलेज पहुंची,,,, बस ये ही दुआ कर रही थी सर न दिख जाये,, नहीं तो जाना  मुश्‍ि‍कल  हो जाएगा,,,अब अगर सामने आये तो फि‍र सारी हिम्‍मत जवाब दे जाएगी,,, सबसे नजरें बचा कर सीधा प्रिसिंपल के ऑफिस पहुंची,, मैं अच्‍छी  स्‍टूडेंट थी,, डॉक्‍यूमंट मिलने में ज्‍यादा टाइम नहीं लगा,,, पर जितनी देर वहां थी यहीं सोच रही थी कि वो सामने न आयें,,, पर असलियत शायद कुछ और थी उन्‍हें आखिरी बार देखने की बैचेनी भी बहुत थी,,, जानती थी कि अब शायद कभी मुलाकात न हो,, एक घंटे तक खुद से लड़ती रही समझ नही आ रहा था कि आखिर मैं क्‍या चाहती हूं पर अब हो भी क्‍या सकता था फैसला तो हो चुका था,, अब सोचों न सोचों क्‍या फर्क पड़ता है जो सामने है उसे बदल नहीं सकते जो हो नहीं सकता उसका गम किसी को बता नहीं सकते। इस कशमकश में एक घंटा कैसे गुजर गया नहीं पता चला,,,प्रिंसिपल ने अपने रूम में बुलाया और डॉक्‍यूमेंटस देते हुए कहा ऑल द बेस्‍ट,, तुम्‍हारी जैसे स्‍टूडेंट हमारे कॉलेज की स्‍टूडेंट रही इसका गर्व है हमें,,, जहां रहना खुश रहना,  कभी इंडि‍या वापस आओ तो मिलना जरूर,, खुशी हुई उनसे ये सुनकर और बस वहां से चली आयी,, अब तो सोच लिया था कि यहां से दूर जाना ही शायद अच्‍छा है,, शायद किस्‍मत को यहीं मंजूर है,, शायद हमारा मिलना लिखा ही नहीं है,,,,,,  

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