गुरुवार, 8 सितंबर 2016

क्यों मुसीबत में फंसे AAP के 21 विधायक ?

आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर आप सरकार अब खुद मुश्किल में घिरती जा रही है संसदीय सचिवों की नियुक्ति को हाईकोर्ट अवैध ठहराया है हालांकि नियुक्ति के समय से ही इसे लेकर बवाल हो रहा था
दिल्ली में सरकार बनने के एक महीने बाद ही आप सरकार ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव का अतिरिक्त प्रभार सौंपा...
  • 13 मार्च 2015 को आप के इन 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया... विपक्ष तो सवाल कर ही रहा था
  • 19 जून 2015 को प्रशांत पटेल नाम के एक वकील ने राष्ट्रपति के पास आप के इन 21 संसदीय सचिवों की सदस्यता रद्द करने के लिए आवेदन दिया।
  • इस पर सरकार ने अपने विधायकों को बचाने के लिये उसी दिन संसदीय सचिवों को लाभ का पद के दायरे से बाहर करने का प्रस्ताव कैबिनेट में पास कर दिया और
  • दावा किया गया कि ये संसदीय सचिव कोई आर्थिक बोझ सरकार पर नहीं डाल रहे. सरकार ने जो प्रस्ताव पास किया उसमें सरकार बनने के समय से यानि
  • 14 फरवरी से अमल में लाने का प्रावधान किया गया ताकि संशोधन के पहले बने संसदीय सचिवों की सदस्यता को कोई आंच ना आए।
  • इस विधेयक का नाम, दिल्ली विधानसभा सदस्य (अयोग्यता निवारण) (संशोधन) विधेयक 2015 था।
संसदीय सचिवों की नियुक्ति के बाद इसे लाभ का पद मानते हुए इस पर  जनहित याचिका भी हाईकोर्ट में दायर की गई साथ ही राष्ट्रपति और चुनाव आयोग के पास भी शिकायत कर इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग की गई।
  • चुनाव आयोग ने 21 विधायकों को मार्च 2016 में नोटिस देकर एक-एक करके बुलाने का फैसला लिया।
  • दिल्ली सरकार के संसदीय सचिवों वाले संशोधन बिल को उपराज्यपाल ने केंद्र और राष्ट्रपति के पास भेजा लेकिन उस पर मुहर नहीं लगी.
  • 13 जून को राष्ट्रपति ने विधेयक को मंजूरी देने से इनकार कर दिया

जाहिर है राष्ट्रपति के फैसले और अब हाईकोर्ट के नियुक्ति को अवैध ठहराने के बाद इन विधायकों की सदस्यता पर खतरा मंडराने लगा है और अब इस मामले पर आखिरी फैसला चुनाव आयोग को करना है। अब आयोग ही तय करेगा कि संसदीय सचिव लाभ का पद है या नहीं।

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