अंश
ने कशिश से पूछा जब तुम यहां
आई तो इतनी अकेली सी क्यों
थी,,
सबके
साथ होते हुए भी सबसे अलग क्यों
रहती हूं,,
तुम्हारे
ऑफिस के लोग भी कह रहे थे कि
तुम अब पहले जैसे नहीं रही,,
इतनी
सीरीयस कैसे हो गई कशिश,,,,,
कशिश
मुस्कुराकर बोली अभी थोड़ी
देर पहले बोल रहे थे कि तुमने
अपनी शौतानी से पूरे होटल को
परेशान कर दिया,,
तुम्हारी
पिटाई होगी और अब बोल रहे हो
कि तुम इतनी सीरीयस क्यों
हो,,
अंश
मुझे लगता है मैं नहीं तुम
कंफ्यूज हो,,,
अंश
कुछ सोचकर बोला पर वो तुम मेरे
साथ हो इसलिये बदमाशी कर रही
हो,,
नहीं
तो,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कशिश
ने बस इतना कहा,,
कमाल
हो तुम अंश,,
सवाल
भी खुद करते हो और जवाब भी खुद
देते हो,,,,,,,,,,,,,
बात
बदलना तुमने भी सीख लिया है
कशिश,,,
अंश
ने कहा
अब
मैंने क्या किया अंश,,चलो
ये सब छोड़ों ये बताओ वो दूर
पहाड़ पर जो मंदिर दिख रहा है
वहां कैसे जाएंगे,,
कशिश
ने पूछा
वहां
जाना है तुम्हें,,
अंश
ने पूछा
हां,
जाना
है कल सुबह चले,,
मेरी
मीटिंग शाम को है दोपहर तक
फ्री हूं बोलो,,
कशिश
ने कहा
ओके
चलते है पर सुबह जाने के लिये
अभी सोना पड़ेगा और तुम्हें
देखकर नहीं लग रहा कि तुम सोने
के मूड में हो,,
अंश
ने कहा
हां
अगर तुम ले जाने का वादा करोगे
तो अभी सो जाउंगी पक्का,,
कशिश
की आवाज में शरारत थी,,
अंश
ने वादा किया कि वो कुछ घंटे
बाद कशिश को उस पहाड़ी वाले
मंदिर ले जायेगा,,
फिर
दोनों कुछ देर सोने चले गये।
ठीक
चार घंटे बाद अंश का फोन बजने
लगा,,
फोन
जल्दी से उठाकर अंश बोला हां
मैं तैयार हूं नीचे आ जाओ,,
कार
में दोनों निकल पड़े,,
एक
घंटे की ड्राइव के बाद उपर
पहाड़ का रास्ता पैदल ही तय
करने वाला है ज्यादा दूर नहीं
है लेकिन पहाड़ी रास्ता है
इसलिये वक्त ज्यादा लगता
है अंश ने कशिश को बताया।
रास्ते
में कशिश ने आकृति के बारे में
पूछा तो अंश ने बताया कि सुबह
ही उससे बात हुई है वो ठीक है,,
कशिश
ने पूछा तुम उसे यहां क्यों
बुला लेते मुझे मिलना है,,
अभी
दो तीन दिन तो हूं मैं यहां
फिर पता नहीं कब मिलना होगा,,,
हां
कशिश मिलवा दूंगा तुम्हें,,
तुम्हारे
जाने से पहले,,,
अंश
ने कहा
पहाड़ों
की सुबह कुछ ज्यादा ताजगी
भरी होती है खाली रास्तों
में इक्का दुक्का गाडि़यां
दिख रही थी,,
ऊंटी
में ये समय टूरिस्ट का नहीं
था इसलिये ज्यादा लोग इस हिल
स्टेशन पर दिखाई नहीं दे रहे
थे,,
कशिश
जैसे इस दिन का हर पल खुलकर
इंजॉय करना चाहती थी अंदर और
बाहर सब कुछ उसे नया नया सा लग
रहा था,,,
इतना
कि उसकी एक्साइटमेंट किसी
छोटे बच्चे की तरह थी,,,
जब
मंदिर का रास्ता दिखने लगा
तो अं
श
ने बताया देखो वो जो रास्ता
है उस पहाड़ पर वहीं से जाते
है,,
पैदल
चलना होगा कुछ देर फिर पहुंच
जाएंगे ।
कशिश
तो खुश थी,
गाड़ी
रुकी और सड़क के एक किनारे कार
पार्क कर अंश ने कशिश को चलने
को कहा,,,
रास्ते
में पत्थर थे,,
किसी
शहरवाले के लिये ऐसे रास्तों
पर चलना आसान नहीं होता अंश
के लिये नहीं पर कशिश के लिये
ये आसान नहीं था वो वही हुआ
जिसका डर अंश को था,,,
वो
बार बार कशिश को संभलकर धीरे
चलने को कह रहा था पर कशिश अपनी
मस्ती में अंश से आगे आगे चल
रही थी,,
कुछ
देर तो सब ठीक था पर अचानक कशिश
का सैंडल टूट गया,,,
अब
क्या करेंगे,,
ये
सवाल दोनों को परेशान कर रहा
था,,,आस
पास कोई बाजार नहीं था और ऐसे
चलना भी मुमकिन नहीं था,,
अंश
ने कशिश से कहा,,
चलो
वापस चलते है वैसे भी हम ज्यादा
दूर नहीं आये है आराम से लौट
जांएगे,
ऐसे
नहीं चल पाओगी,
चोट
लग जाएगी।
पर
कशिश कहां सुनने वाली थी उसने
अंश को कहा,,
मैं
वापस नहीं जाने वाली तुम्हें
चलना पड़ेगा मेरे साथ हम ऐसे
ही जाएंगे।
बिना
सैंडल तुम्हें पता है तुम्हारे
पैरों का क्या होगा,,
अंश
ने थोड़ा गुस्से में कहा
कुछ
नहीं होगा अंश चलो न,,
मैं
ठीक हूं,
देखो
हम धीरे धीरे संभल संभल कर
चलेंगे,,
जैसे
तुम कह रहे थे,,
अब
पक्का मैं तुम्हारी बात
सुन लूंगी,,,,
कशिश
अंश को मनाने की कोशिश कर रही
थी पर अंश भी अपनी जिद पर अड़ा
था,,
काफी
देर सोचने के बाद अंश ने कहा
ठीक है पर तुम यहीं रुको मैं
अभी आता हूं,,,
ये
कहकर अंश वापस नीचे उतरने
लगा,,
कशिश
को कुछ समझ नहीं आया पर कोई
चारा नहीं था उसे बस अंश का
इंतजार करना था,
पर
वो सोचती रही थी आखिर अंश गया
कहां है
थेाड़ी
देर में अंश लौट आया,,
कशिश
ने पूछा तो अंश ने कुछ कहा नहीं,
पर
अब अंश को देखकर कशिश को गुस्सा
आ रहा था,,
गुस्सा
क्यों,,????
क्योंकि
इस बार अंश ने कशिश की तरह ही
हरकत की थी,,
अंश
कशिश के लिये सैंडल तो नहीं
ला सका लेकिन अपने जूते गाड़ी
में छोड़कर आया था,,
अंश
को नंगे पैर देखकर कशिश ने उसे
डांटना शुरु किया,,
अंश
ये क्या बचपना है तुम अपने
शूज क्यों उतार कर आये हो,,
अंश
को अब बहुत मजा आ रहा था क्योंकि
अब उसे पता था कि कशिश को वैसा
ही लग रहा है जैसा उसे लगता है
जब कशिश इस तरह का पागलपन करती
है
अंश
ने कशिश से कहा चलो अब बहुत हो
गया,,
तुम
तो वापस नहीं जाना चाहती थी
न तो मेरे पास कोई रास्ता
नहीं था,,,,
कशिश
का मूड खराब था उसे अपनी तकलीफ
से तकलीफ नहीं थी लेकिन अंश
को जबरदस्ती दर्द में देखना
उसे अच्छा नहीं लग रहा था ,,
अंश
ने कशिश का मूड ठीक करने के
लिये उससे कहा,,
चलो
एक कहानी सुनाता हूं,,
पता
है पहाड़ों में भूतों की कहानी
बहुत मश्हूर होती है और यहां
के लोग कहते है बहुत साल पहले
ऐसे ही दो लड़का लड़की पहाड़
चढ़ रहे थे और अचानक उनका पैर
फिसल गया,,
दोनों
एक गुफा के बाहर गिरे,,
चोट
लगी थी लेकिन ठीक थे,,,जब
आंख खुली तो सामने रास्ता
सिर्फ गुफा के अंदर जाने का
था लड़की थोड़ा डर रही थी कि
आगे जाये या नहीं,,
क्या
पता अंदर क्या होगा,,
पर
लड़के ने कहा चलो देखते है जो
भी होगा देख लेंगे वैसे भी
इसके अलावा कोई रास्ता नहीं
है,,
जैसे
जैसे दोनों उस गुफा के अंदर
जा रहे थे अंधेरा बढ़ रहा था
पर दूर कहीं से एक रोशनी की
किरण भी दिख रही थी,,
दोनों
उस रोशनी की तरफ बढ़ने लगे,,
वहां
उस गुफा की दीवारों पर कुछ ऐसे
निशान दिख रहे थे जिससे लग रहा
था कि पहले भी लोग यहां आ चुके
है गुफा बहुत लंबी थी चलते
चलते बहुत वक्त हो गया था वो
निशान जो वहां बने थे वो इशारा
कर रहे थे कि यहां खतरा है,
उन्हें
देखकर देानों को थोड़ा डर भी
लग रहा था पर वो शायद इस बात
से निश्चिंत थे कि वो एक दूसरे
के साथ है जब डर लगता था तो जोर
से हाथ पकड़ लेते थे और जब थक
जाते थे तो एक,,
दूसरे
को आराम करने को कहता था और जब
दोनों में से कोई एक निराश
होता था तो दूसरा उसे हिम्मत
देता था,,,,
और
फिर नए जोश के साथ दोनों आगे
बढ़ते थे,,
पता
है कई बार तो दोनों कुछ सपने
भी बुनने लगते थे कि जब यहां
से बाहर निकलेंगे तो क्या
करेंगे,,
अंधेरे
में भूतों की मौजूदगी की आहट
भी कभी कभी डरा जाती थी पर जैसे
जैसे उस रोशनी की तरफ वो बढ़
रहे थे रोशनी फैल रही थी,,
और
आखिर में जब बाहर आये तो देखा
सामने एक खूबसूरत सा बगीचा
था जहां रंग बिरंगे फूल थे,,
मीठे
मीठे फलों के उंचे उंचे पेड़
थे बस ये देखकर वो दोनों अपना
सारा दर्द भूल गये और वहां
सुकून से रहने लगे,,
कुछ
दिन ऐसा लगा जैसे वो जन्नत
में थे सब कुछ इतना खूबसूरत
था कि वो सब भूलकर वहीं रुक
गये पर वो जगह एक झरने के पास
थी पहाड़ों के बीच,,
जब
बारिश आई तो पूरा बगीचा पानी
के साथ बह रहा था,,
पेड़
पौधे सब बस उस सैलाब के साथ बह
रहे थे अपनी जान बचाने के लिये
दोनों को एक बार फिर उसी गुफा
में जाना पड़ा,,
इस
बार इस गुफा में जाने से दोनों
डर रहे थे क्योंकि उनकी ये
खूबसूरत दुनिया फिर अंधेरे
में जा रही थी,,
कैसे
जाते इस बार इस गुफा में,,
लेकिन
कोई रास्ता नहीं था पीछे कुछ
नहीं बचा था अब जाना ही था नहीं
तो जिंदा नहीं रह पाते। बुझे
मन से,,
बोझिल
कदमों से एक बार फिर वो निकल
पड़े उसी गुफा में,,
इस
बार दोनों को पता था कि ये गुफा
ज्यादा लंबी है वो इससे पहले
गुजर चुके है और रास्ते में
अंधेरा भले ही हो गुफा के उस
पार रोशनी ही रोशनी होगी। बस
फिर क्या था दोनों ने एक
दूसरे का हाथ पकड़ा और गुफा
पार करने चल पड़े।
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