सांइटिफिक
ट्रूथ है जब हम सोते है तो हमारी
मेमोरी रिचार्ज होती है,
अच्छी
नींद आये तो सुबह का रंग और
चमकदार लगता है कशिश जब कांफ्रेस
के लिये पहुंची तो बहुत फ्रेश
लग रही थी,,
वैसे
ही फुल ऑफ लाइफ जैसी अंश को
याद दी। अंश अपना काम कर रहा
था,
कांफ्रेस
का पूरा एरेंजमेंट उसे ही
देखना था,,
और
जब उसकी नजर कशिश पर पड़ी तो
उसकी एक मुस्कान से अंश समझ
गया कि वो अब ठीक है,,
अंश
कशिश के पास गया और पूछा,,
नींद
अच्छी आई?
,, थकान
दूर हुई?
हां,
आज
पता चला कि सोना इतना जरुरी
क्यों होता है आज तो मुझे भी
लगा जो सोता है वो खुश रहता
है,,
कशिश
ने जवाब दिया
तैयारियां
पूरी हो चुकी थी और अब बस कांफ्रेस
शुरु हो रही थी,
सब
अपनी जगह पर बैठ गये और सुनने
लगे।
काम
खत्म करके अंश ने कशिश को फोन
किया और शाम को दोनों का बाहर
घूमने का प्लान बना। कशिश
तैयार होकर नीचे आ गई और अंश
को ढूंढने लगी,,
कुछ
पल में ही अंश उसके सामने था,,
पर
अंश को देखकर वो थोड़ा शॉक
थी,,
अंश
भी हैरान था कि कशिश के चेहरे
का रंग अचानक क्यों उड़ गया,,
अंश
ने पूछा,
क्या
हुआ ऐसा मुंह क्यों बनाया,,
कशिश
ने अंश से कहा,,
तुम
ऐसे चलने वाले हो मेरे साथ,,
अंश
ने खुद को देखा और पूछा,,
मतलब
कैसे?
अंश
हम घूमने जा रहे है या ऑफिशियल
मीटिंग में,,
तुमने
चेंज क्यों नही किया,,
इतना
फॉर्मल होने की क्या जरुरत
है कशिश ने कहा,
अच्छा,
ये
बात है,
वैसे
मैं चेंज करने नहीं जा रहा,,
चलो
ऐसे ही,,
टाइम
नहीं है अब,,
अंश
ने कहा,,,
कशिश
ने अंश को गुस्से से देखा और
कहा अंश ऐसे एंजॉय कैसे करोगे,
तुम्हारे
कपड़े खराब हो जाएंगे,,
अंश
ने पूछा क्यों,
खराब
क्यों हो जाएंगे?
कशिश
ने जवाब दिया,
मुझे
बोटिंग करनी है और ऐसे तुम
बोटिंग कैसे करोगे,,
चलो
कशिश,,
नहीं
तो मैं अकेले जा रहा हूं अंश
ये कहकर गाड़ी स्टार्ट करने
लगा।
कशिश
के पास अब कोई चारा नहीं था वो
गाड़ी में जाकर बैठ गई।
अंश
ने कशिश का मूड ठीक करने के
लिये म्यूजिक चला दिया,,
मौसम
सुहाना था शाम होने में अभी
वक्त था,,
ऊटी
लेक ज्यादा दूर नहीं थी,,
वहां
पहुंचने से पहले अंश ने कशिश
को पिछली सीट से कुछ सामान
उठाने को कहा,,
कशिश
ने वो पैकेट उठाया और अंश को
देने लगी पर अंश ने उसे ही वो
खोलने को कहा,,,
जब
खोला तो देखा कि उसमें कुछ
चॉकलेट्स थी कशिश का सारा
गुस्सा फुरर्र हो गया था
क्योंकि चॉकलेट्स उसे बहुत
पंसद थी।
चॉकलेटस
खाते खाते दोनों लेक तक पहुंच
गये,,
नीले
पहाड़ ऊटी की शान है,,
पहाड़ों
के बीच बनी ये झील,
आसपास
देवदार और चीड़ के बड़े बड़े
पेड़,,हल्की
ठंडी हवा और पानी की लहरों के
साथ बहती बोट। झील के किनारों
पर रंग बिरंगे फूल इसकी खूबसूरती
को और बढ़ा रहे थे। अंश और कशिश
दोनों बोट में सवार हो गये थे
अंश कशिश को इस जगह की खूबसूरती
और इसके इतिहास के बारे में
बता रहा था और कशिश चुपचाप उसे
सुन रही थी।
अचानक
पानी का बहाव कुछ तेज लग रहा
था,,
कशिश
इस पानी को छूना चाहती थी पर
बोट की उंचाई से नीचे हाथ डालना
थोड़ा रिस्की था,
पर
वो कोशिश कर रही थी अंश का
ध्यान जब उसकी तरफ गया तो वो
कशिश को मना करने लगा
तुम
नहीं मानोगी हाथ के साथ पूरी
गिर जाओगी,,
पानी
का बहाव बहुत तेज है कशिश,,,
अंश
ने कहा,,
मुझे
डर नहीं लगता तुम हो न संभालने
के लिये,,
कशिश
ने कहा
हां
मैं तो हूं पर,,,,संभल
जाओ,,
कशिश,
अंश
ने फिर कहा
अंश,
पता
है सबसे ज्यादा दुखी कौन रहता
है जो सबसे ज्यादा महसूस करता
है सुख हो या दुख,,,,
उसे
महसूस करने वाला सबसे ज्यादा
परेशान रहता है इसलिये थोड़ा
सा पागल होना जरुरी है हर वक्त
खुद को बांध कर रखने की क्या
जरुरत है कहीं तो कभी तो बस वो
करो जो दिल कहता है,,
और
आज मुझे कुछ नहीं सोचना,,
ये
नीला आसमान,,
ठंडा
ठंडा पानी और ये हवा में खुश्बू
बस लेट मी इंजॉय,,
मत
टोको मैं नहीं सुनने वाली,,,
कशिश
ने कहा
कब
से शायद कुछ अंदर दबा था आज बस
बाहर आ गया,,
कशिश
को नेचर से बहुत लगाव है वो
ऐसी ही जिंदगी चाहती है जहां
पहाड़ हो,
झीलें
हो,
बड़े
बड़े पेड़ों की छांव हो,
हवा
में ताजगी हो,
खुले
आसमान के नीचे जहां वो घंटों
बस यूंही कुछ सोचते हुए गुजार
दें,,
जिंदगी
शहरों की तरह भागती दौड़ती न
हो,
जहां
मशीनों पर काम करने वाले लोग
खुद भी उन्हीं मशीनों की तरह
बन गये है कितने अजीब होते है
ये शहर बड़े बड़े सपने दिखाते
है और जिस वक्त हम उन्हें
पूरा करने में जुटे होते है
वो हमसे धीरे धीरे सब छीनते
जाते है क्या अब याद है सर्दी
की वो धूप,,
जब
आंगन या छत पर बचपन में बैठकर
मूंगफली खाते थे,,
रात
को रजाई में दुबक कर कांपते
हाथों से टीवी का रिमोट पकड़कर
धीमी आवाज में टीवी देखते थे
और जैसे ही किसी की आहट हो पावर
बटन ऑफ कर रजाई में घुसकर सोने
की एक्टिंग करते थे,,
याद
है वो गर्मी की शामें जब मम्मी
के साथ बाजार जाते थे इस उम्मीद
में कि कोई न कोई अच्छी चीज
वो दिला ही देंगी। याद है वो
सुबह सुबह की बारिश जब बारिश
के न रुकने की दुआ मांगते थे
क्योंकि बारिश नहीं रुकेगी
तो स्कूल नहीं जाना पड़ेगा।
बचपन तो बचपन है उसे तो बीतना
ही है पर धीरे धीरे जिंदगी इन
बड़े शहरों की चकाचौंध में
कब आखिरी मोड़ पर पहुंच जाती
है ये भी पता नहीं चलता। बस कल
को बेहतर बनाने में जुटे रहते
है और आज जो है उसे खो देते है,,
कशिश
और अंश झील के किनारे बैठे
कुछ ऐसी ही बातें कर रहे थे
दोनों अपने बचपन की यादों में
खोए थे,,
शायद
बहुत कुछ मिस कर रहे थे और चाहते
थे कि अगर उन्हें कभी मौका
मिले तो वैसे ही जिए जैसे वो
चाहते हैं
बातें
करते करते वक्त बीत रहा था,,
धीरे
धीरे अंधेरा बढ़ रहा था और अंश
ने कशिश को चलने के लिये कहा,,
दोनों वहां से निकले और होटल वापस लौट आये,, डिनर के लिये डायनिंग हॉल पहुंचे तो अंश ने कशिश से पूछा क्या ,खाओगी?
कशिश
ने अंश को बताने के बजाय सीधे
वेटर को बुला कर ऑर्डर कर दिया,,
अपने
लिये चायनिस और अंश के लिये
डोसा।
तुम्हें
याद है मुझे डोसा पंसद है अंश
ने पूछा
हां
मुझे तो याद है पर तुम तो भूल
गये न मुझे क्या पंसद है कशिश
ने कहा
अंश
ने सर हिलाकर कहा नहीं ऐसा
नहीं है मुझे याद है पर सोचा
शायद अब पंसद बदल गई हो,,
पंसद
कैसे बदलेगी अंश,,
कशिश
ने कहा,,
ओह
ये तो बहुत गर्म है,,
अंश
डोसा खाने की जल्दी में था,
और
उसे गर्म लगा
अंश
इतनी भूख लगी है कशिश ने हंसते
हुए कहा,,,,
डिनर
के बाद अंश ने कशिश को उसके
रुम तक छोड़ा और गुड नाइट बोल
कर चला गया।
कशिश
खुश थी कितने दिन बाद उसे भी
याद नहीं,,
खिड़की
के पास खड़ी कशिश कुछ सोच रही
थी कि तभी उसका फोन बजा ,,
फोन
सागर का था,,
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