गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

वो पनाह दोस्‍ती है...


लड़खड़ाते कदमों को सँभाले,
वो हाथ दोस्‍ती है
जि‍से सुनते ही हँस दे दि‍ल,
वो बात दोस्‍ती है

अंगारों को बना दे जो फूल,
वो जादू दोस्‍ती है
बदलकर रख दे जो हर भूल,
वो काबू दोस्‍ती है

अंधेरों को कर दे जो रोशन,
वो दीप दोस्‍ती है
हर आँसू को कर दे मोती,
वो सीप दोस्‍ती है

दि‍ल के हर दर्द पर हो महसूस,
वो कराह दोस्‍ती है
भटकाव के हर मोड़ पर मि‍ले,
वो पनाह दोस्‍ती है

हर नाकामी को जो हरा दे,
वो जीत दोस्‍ती है
हर जमाने में रहे जो जिंदा,
वो रीत दोस्‍ती है....

वो रीत दोस्‍ती है....

वो रीत दोस्‍ती है....

  
यारों दोस्‍ती बड़ी ही हसीन है ये न हो तो क्‍या फि‍र बोलो ये जिंदगी है,,,,,,,,,,,,

पर समय के साथ हम शायद दोस्‍ती के बिना ही जीना सीख लेते है हो भी क्‍यों न आजकल समय किसके पास है सुबह सुबह उठकर घर का काम निपटाना है,, फि‍र ऑफि‍स जाना है,, देर तक काम करना है डेडलाइन जो है,,, जॉब की टेंशन, घर की टेंशन, परिवार की टेंशन और इन सब टेंशन के बीच दोस्‍तों की टेंशन कैसे ले। किसी को गलती से याद आ भी जाती है तो फोन कर लेता है लेकिन फोरमेलिटी से ज्‍यादा शायद बात करने का समय ही नहीं होता। चलो आज अपनी लाइफ दस साल रिवांइड करते है जो आज है क्‍या उसकी कल्‍पना की थी कभी,,,,,,,क्‍या सपने थे उस वक्‍त,,,,,फयूचर सिक्‍योर नहीं था,,,इतने पैसे भी नहीं थे,, मामूली सी पॉकेटमनी से एक मूवी देख ली तो ही खुश हो जाते थे,, ऑटो छोड़ो बस में जाने के भी पैसे नहीं थे तो पैदल चल पड़ते थे,, पापा ने डांटा तो क्‍या लेट आना तो बनता था,,,,कॉलेज में पढाई की किसको पड़ी थी मैक डॉनल्‍डस का बर्गर खाने कब जाना है ये ज्‍यादा जरूरी था,, कहीं भी कभी भी गाने गाना,, कॉलेज की कैंटिन में डोसा खाते खाते प्रोफेसरों के नाम रखने का सिलसिला,,,,, कॉलेज फेस्‍ट में क्‍या ड्रेस पहननी है इसकी टेंशन तो कई दिनों तक साथ रहती थी,,,मां को आज तक समझ नहीं आया कि कॉलेज से घर तक का रास्‍ता जो पंद्रह मिनट का होता था उसमें दो घंटे क्‍यों लगते थे। याद आता है वो सब,,, वो दोस्‍त जो जिंदगी के सफर में कितने पीछे रह गये ऐसा नहीं कि वो आज साथ नहीं,,,, हां हम मिलते है घर में किसी की शादी या बर्थडे होता है तो साथ होते है लेकिन वो बात नहीं होती जैसे पहले थी,,,कैसे हो सकती है इतनी भीड़ में जो गुम हो गये वो जज्‍बात,,, इतने रिष्‍ते है जिन्‍हें निभाना जरूरी है फि‍र दोस्‍ती के लिये जगह ही कहां है,,, पर पता नहीं क्‍यों मन कर रहा है फि‍र उस दौर में जाए जहां से मम्‍पी पापा के साये से बाहर निकल कर इंडीपेंडेंट होने की शुरूआत की थी,, कॉलेज का वो पहला दिन,,,, वो पुराने दोस्‍त जिनके साथ मस्‍ती भरे दिन बेफि‍क्र होकर गुजारे थे, सब याद आ रहे है,,,,,, क्‍या वो दिन फि‍र लौटेंगे,,, नहीं कभी नहीं,,, अब तो ऐसे ही जीना पड़ेगा,,,जो बीत गया वो लौट नहीं सकता,,,,,,ये सोच कर कशिश अपनी जिंदगी जी रही थी जहां थी जैसे थी खुश थी,,कभी सोचा नहीं था जिंदगी फि‍र करवट लेगी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,                    


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