सुबह
की पहली किरण जब खिड़की के
पर्दे से अंदर आई तो सीधे काश्वी
की आंखों में लगी,,,,
उसने
आंखे खोली तो बाहर की ताजगी
कमरे में दाखिल होती महसूस
की,,,
अपने
फोन में टाइम देखा तो सुबह के
छह बज रहे थे काश्वी के पास
टाइम काफी था सुबह दस बजे से
उसकी वर्कशॉप शुरु होनी थी,,,
पर
अब उसकी आंखों से नींद गायब
हो गई थी,,,
अपने
बिस्तर से उठ कर काश्वी खिड़की
के पास गई तो बाहर वो नजारा था
जो रात के अंधेरे में खो गया
था,,,
जिस
घर में वो सब थे वो एक उंचे
पहाड़ पर था जहां से आस पास के
खूबसूरत नजारे साफ दिख्र रहे
थे,,,
वादियों
का ये नजारा एक परफेक्ट ग्रीन
फ्रेम की तरह लग रहा था,,,
इस
नजारे को काश्वी एक फोटोग्राफर
की नजर से देख रही थी और उसे
समझ भी आ रहा था कि उत्कर्ष
यहां क्यों रह रहे हैं,,,
इतनी
खूबसूरत जगह पर प्रकृति का
एक एक अंश अगर कैमरे में उतारा
जाए तो शायद सालों बीत जाये,,,,
काश्वी
जल्दी से बिस्तर से उठकर तैयार
होने चली गई,,,
एक
घंटे के बाद अपनी बैग और कैमरा
लेकर वो बाहर निकल गई,,,,
सुबह
सुबह की हल्की ठंड में काश्वी
अपने कैमरे के साथ चारों तरफ
देख रही थी,,,
उंचे
उंचे शान से खड़े पहाड़ों की
तस्वीरें खींचने से उसने
शुरुआत की,,,,
फिर
पेड़,,
पत्ते
और फूल,,,
हर
रंग को अपने साथ ले अपने कैमरे
में कैद कर लेना चाहती थी
काश्वी,,,,
जब
अकेले होते हैं तो उन चीजें
पर भी नजर जाती है जो सबके साथ
दिखाई नहीं देती,,,
काश्वी
को एक हरे पत्ते पर बैठी छोटी
सी तितली दिखाई दी,,,
अपनी
नजर से देखने के बाद अपने कैमरे
में उसे हूबहू उतारने की कोशिश
में काश्वी लगी थी पर उसके
कैमरे का फ्रेम वैसा नहीं लग
रहा था जैसा उसे आंखों से दिख
रहा था,,,
क्या
था ये,,,
वो
तितली जिसके पंखों में रंगों
का अजीब सा लेकिन सुंदर ताना
बाना था कैमरे का फ्रेम उस
बारिकी को कैप्चर नहीं कर पा
रहा था,,,काश्वी
ने बहुत कोशिश की,,,
हर
एंगल से उसे तस्वीर बनाने की
सोची लेकिन कहीं से भी वो
खूबसूरती उसके कैमरे में उतर
नहीं पा रही थी जो उसे दिखाई
दे रही थी,,,,,
काश्वी
इसी उधेड़बुन में थी कि ये
कैसे होगा,,,
उसका
कैमरा तो हाईटेक था फोकस भी
ठीक था तो फिर क्यों नहीं,,,,
जब
तक वो ये सोच रही थी वो तितली
हवा के एक झोके के साथ वहां से
उड़ गई,,,,,पर
अपने पीछे काश्वी के लिये एक
सवाल छोड़ गई कि क्या जो हम
देख रहे हैं उसे उसी रुप में
उसी अंदाज और उसी भावना के साथ
वो महसूस करेगा जो उसकी तस्वीर
देखेगा,,,,,,,,,,
अगर
ये होगा तो कैसे,,,,,,
काफी
देर हो चुकी थी काश्वी को समय
का पता ही नहीं चला,,,,
बस
पद्रंह मिनट के बाद उसकी क्लास
शुरु होनी थी,,,
उसे
घड़ी देखी तो फटाफट वापस लौटी,,,
लेकिन
वापस आकर उसने देखा कि कोई भी
अपने रुम में नहीं था सेंट्रल
हॉल भी खाली था पूरी बिल्डिंग
में खामोशी थी उसे पता ही नहीं
चला कि वो कहां जाये,,,,,,,काश्वी
थोड़ा घबरा गई और इसी घबराहट
के बीच उसे याद आया कि निष्कर्ष
का नंबर उसके पास है उसे फोन
करके पता कर सकते हैं कि क्लास
हैं कहां,,,,,
काश्वी
ने निष्कर्ष को फोन किया,,,
निष्कर्ष
ने फोन उठाया तो वो कुछ हैरान
था,,,
फोन
उठाते ही बोला,,,
हां
काश्वी बोलो,,,,
तुम
क्लास में से कैसे फोन कर रही
हो,,,,,
निष्कर्ष
का सवाल सुनकर काश्वी चुप हो
गई फिर झेपते हुए बोली,,
मैं
क्लास में नहीं हूं और मुझे
पता भी नहीं क्लास है कहां,,,,
निष्कर्ष
ने फौरन ही पूछा,,,
मतलब
कहां हो तुम?
सबको
तो बताया था क्लास कहां है फिर
तुम कहां हो?
वो
मैं लेट हो गई सब लोग जा चुके
हैं और मुझे पता नहीं कहां
जाना है अगर आप हैल्प करते
तो,,,,,,,,ये
कहकर काश्वी चुप हो गई,,,,
हां
ठीक है एक काम करो तुम सेंट्रल
हॉल आओ मैं आता हूं,,,
निष्कर्ष
ने कहा
करीब
दो मिनट के अंदर ही निष्कर्ष
वहां पहुंच गया,,,
काश्वी
को डरा हुआ देखा तो निष्कर्ष
ने उससे कुछ पूछा नहीं बस उसे
अपने साथ चलने का इशारा कर
दिया
निष्कर्ष
ने काश्वी को क्लास के अंदर
छोड़ा,,,
उत्कर्ष
क्लास ले रहे थे और निष्कर्ष
के साथ काश्वी को देखकर चौंक
गये,,,,
उत्कर्ष
ने कहा काश्वी तुम लेट हो,,,
इससे
पहले की काश्वी कुछ कहती,,,
निष्कर्ष
बोल पड़ा और कहा वो रास्ता भूल
गई,,,,
मैं
छोड़ने आया हूं,,,,,
उत्कर्ष
ने दोनों को गौर से देखा और
काश्वी को बैठने का इशारा
किया,,,
निष्कर्ष
वहां से चला गया,,,,,,,
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