सेतु
के बारे में सुनकर अंश को अच्छा
लगा,,,,,
उसने
कशिश की तारीफ भी की,,,
लेकिन
कुछ सोच में पड़ गया,,,
अंश
को देखकर कशिश से उससे पूछा,,,,
क्या
हुआ?
क्या
सोच रहे हो?
कुछ
नहीं,,,
बस
यूं ही सोच रहा था कि इस प्रोजेक्ट
से जुड़ना कितने मायनों में
खास है,,,
तुम
भी हो और ये सेतु कितने लोगों
की मदद करेगा,,,
बस
कुछ महीने और कशिश हम इसे पूरा
कर लेंगे,,,,
अंश
ने जवाब दिया,,,,,
सेतु
बन रहा था,,,
सेतु
की एक एक ईंट के साथ अंश और कशिश
की पुरानी यादें ताजा हो रही
थी दोनों रात दिन इस कोशिश में
लगे रहे कि ये सेतु इतना मजबूत
हो कि कभी टूटे नहीं,,,,,,,,,
जून
की गर्मी को खत्म करने बारिश
की बूंदे आने वाली थी,,
सेतु
की इमारत तैयार थी उसे अंदर
से सजाने का काम थिरा और कशिश
के हाथ में था अंश कुछ काम से
बाहर गया था जब वापस लौटा तो
अपने साथ ठंडी ठंडी बारिश के
बूंदे भी ले आया था,,
पहाड़ों
की पहली बारिश थी वो,,,
पूरी
वादी में बादलों का अंधेरा
छा गया,,
हरी
हरी पत्तियां बूंदों से नहाकर
और खूबसूरत हो गई,,
सूखे
दरख्तों पर फिर से ताजगी आ गई
थी,,,
अंश
और कशिश बारिश को देख रहे थे,,
तभी
अंश ने कशिश से कहा,,
लो
बारिश आ गई,,,
और
उससे पहले ही सेतु बन गया है,,,
अब
तो खुश हो ना,,,,,,जो
चाहिए था सब मिल गया,,,,,,,,
कशिश
ने अंश को देखा और मुस्कुरा
कर कहा,,
हां
सब मिल गया,,
पर,,,,,ये
कहकर कशिश चुप हो गई,,
उसके
चेहरे पर फिर वही बदमाशी भरी
मुस्कुराहट थी,,,,
अंश
ने पूछा,,
क्या
पर???
एक
दोस्त की जरुरत आज भी है,,,,कशिश
ने कहा,,,,
मैं
हूं तो तुम्हारे पास,,
अंश
ने कहा
नहीं
तुम पार्टनर हो,
दोस्त
नहीं,,,
मुझे
ऐसा दोस्त चाहिए जो मेरे साथ
रहे हमेशा,,,
कशिश
ये कहते कहते अपनी जगह से उठकर
दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई,,,
बाहर
बारिश हो रही थी,,
लग
रहा था जैसे बादल आज दिल खोल
कर बरस रहे हो,,,,
कभी
बिजली कड़क रही थी तो कभी बारिश
की बूंदों की आवाज गूंज रही
थी,,,,,
अंश
भी कशिश के साथ आ कर खड़ा हो
गया,,,,
और
पूछा,
तुम्हें
अधूरी चीजें पंसद नहीं ना
कशिश,,,
नहीं,,,,
कशिश
ने जवाब दिया,,,,
ठीक
है तो अपना हाथ दो,,,
अंश
ने कहा
क्यों,,
क्या
हुआ,,
कशिश
ने हैरानी से पूछा
पूरा
कर देता हूं जो अधूरा है,,,
अंश
ने धीरे से कहा,,,
कशिश
अंश को देखती रही,,
उस
एक पल में उसे लगा जैसे सब कुछ
ठहर गया हो,,,
अंश
क्या कहना चाहता है वो समझने
की कोशिश कर रही थी,,,कुछ
देर उसके चेहरे को देखती रही
और फिर कहा,,,
अब
हाथ पकड़ कर क्या करोगे अंश,,,
पहले
तो कभी कहा नहीं,,,,,,
तुम्हारा
जवाब जानता था इसलिये कभी कहा
नहीं,,,
अंश
ने जवाब दिया,,,
अंश
के चेहरे पर एक सुकून लग रहा
था जैसे उसके दिल से कोई बोझ
हटा हो,,,,
अंश
चुप हो गया,,,
बारिश
भी अब खत्म हो चली थी,,,
कुछ
सोचते हुए,,,
अपनी
धुन में अंश बाहर आ गया,,,,,,
पर
कशिश कहां मानने वाली थी उसे
अब भी अधूरे जवाब पंसद नहीं,,ये
बात उसे पूरी करनी थी तो वो
अंश के पास बाहर आ गई और पूछा,,
इतने
साल नहीं कहा तो आज क्यों,,???
तुम्हारा
असर है,,,रहा
नहीं गया,,,सोचा
आज कह दूं,,,
अंश
ने थोड़ा मुस्कुराते हुए जवाब
दिया,,,
अच्छा,,
और
इस अधूरे सवाल की शुरुआत कब
हुई,,,
कशिश
ने पूछा
तुम्हें
याद है वो बारिश जब मैं घर जा
रहा था,,,,और
तुम मुझसे मिलने आई थी मुझे
छोड़ने के लिये,,,
तब
लगा था,,,
अंश
ने कहा
क्या,,
तब,,
मतलब
तुम जब आकृति से पहले उससे
पहले,,
कशिश
ने पूछा
हां,,
तब
ही,,
पर
उस वक्त समझ नहीं पाया था,,,आकृति
से मिलकर जब वापस लौट रहा था
तो पूरे रास्ते तुम्हारे बारे
में ही सोचता रहा,,
ये
भी सोचा कि तुम्हें बता भी
दूंगा जो कशमकश उस वक्त चल रही
थी पर जब वापस लौटा तो तुमने
सागर के बारे में बताया,,,
इतना
कहकर अंश चुप हो गया
कशिश
उस दिन को याद कर रही थी,,,
उसे
याद आ रहा था कि कैसे अंश के
लौटते ही उसने सागर की बात उसे
बताई थी और ये भी कि उससे पहले
कभी उसका जिक्र नहीं किया
था,,,
अपनी
यादों से वापस लौटी तो कशिश
ने अंश से पूछा,,,,
तब
कहा क्यों नहीं अंश?
तुम्हारी
बातें सुनकर तुम्हार जवाब
जान लिया था कशिश इसलिये नहीं
पूछा,,,
अंश
ने कहा
और
आज,,
आज
मेरी बातों से क्या लगता है,,,
आज
नहीं जान पाये मेरा जवाब,,,
कशिश
ने अंश की आंखों में देखते हुए
कहा,,,
जानता
हूं,,
आज
भी जान लिया,,
पर
इस बार सोचा बोल के देख लू,,,
अंश
ने जवाब दिया,,,
कशिश
और अंश उस पहाड़ से ढलते सूरज
को देख रहे थे,,,
वो
सूरज जिसकी हल्की होती रोशनी
ने पूरे माहौल को सुरमयी करना
शुरू कर दिया था,,
पंछी
अपने घर लौट रहे थे,,,
पहाड़ों
से गुजरती सड़क पर अब कुछ
गाडि़यां ही नजर आ रही थी,,
सब
अपने घर लौट रहे थे,,,,
अंश
और कशिश खामोश ये सब देखते
रहे,,
इसी
बीच अहिस्तां से कशिश ने अंश
का हाथ अपने हाथ में लिया और
धीरे से कहा,,,
मुझे
एक दोस्त चाहिए जिससे दूर होने
ना पड़े,,,,,,,,,,,,,,
अंश
ने कशिश के हाथ पर अपना हाथ पर
रखा और कहा तुम्हारा वो दोस्त
तुम्हारे साथ है,,,,,
अंश
और कशिश की ये दोस्ती शायद
किताबी लगे इनकी बातें,,,
इनकी
चाहतें शायद फिल्मी लगे,,
लेकिन
जिंदगी की सच्चाई यही है कि
हर मोड़ पर हमें उस अंश की तलाश
रहती है जो हमारे हर दुख में
हमारे साथ हो,,
जिसके
साथ रहने से मुश्किलों का
मुकाबला करना आसान लगे,,,हर
खुशी का एहसास दुगुना हो
जाये,,,,भरोसा
खुद से भले उठने लगे लेकिन उस
पर हमेशा यकीन रहे,,
जिसे
सोच कर लगे कि कोई हो न हो वो
बस पास रहे,,,,ऐसा
कोई कहीं अगर हो तो वो मिले या
मिले उसकी कशिश हमेशा साथ रहती
है,,,
और
ये कशिश उस अंश को कही न कही
जिंदा रखती है,,,,,,,,,,,,,,,,,
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