सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

इंसान या भगवान किसकी सेवा बड़ी ?



एक गरीब बच्चा सिर्फ़ चार का अपने पेट की भूख मिटने के लिए शनिवार को गुरूद्वारे पंहुचा क्यूंकि हफ्ते के सिर्फ़ इस्सी दिन वहां स्पेशल प्रसाद के रूप में काले छोले मिलते हैं। पूरे उत्साह के साथ वोह भी अन्दर बैठा चुप चाप दो घंटे तक कीर्तन सुनता रहा इस उम्मीद में की अरदास के बाद उसकी भूख मिटेगी। उससे वोह मिलेगा जो उसकी ग़रीब माँ
चाहते हुए भी नहीं खिला सकती। बहरहाल समय गुजरा कीर्तन की गूंज ख़तम हुई अरदास में अमीरों ने हजारों रुपए दिए। अब बारी थी प्रसाद की तो आगे थे वही आमिर लोग जिनसे
गुरूद्वारे का इंतजाम चलता था। वोह नन्हा बच्चा पीछे खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था.
कुछ मिनटों बाद उसकी बारी आखिरकार आ ही गई उसे प्रसाद मिला लेकर वोह काफी कुश हुआ पर उस थोड़े से प्रसाद से उसका मन नहीं भरा आखिर उसे फिर एक हफ्ता इसके लिए इंतजार जो करता पड़ता तो फिर वोह एक बार पहुच गया हाथ फैले लेकिन इस बार उससे वहां से भगा दिया गया क्यूंकि भगवन के प्रसाद पर सबका हक होता है यह किसी एक के पेट भरने के लिए नहीं है। निराश होकर वोह बच्चा वहां से चला गया। ये बात शायद कुछ देर बाद वोह भूल भी गया होगा लेकिन यह हमें सोचने पर मजबूर करता हैं की हम मन्नत पूरी होने पर हम लाखों रुपए भगवन को चडाते हैं लेकिन किसी ग़रीब को खिलने के लिए हमारे पास कुछ नहीं।मंदिरों की सम्पति घहने करोंरों पार कर रहे हैं लेकिन गली गली में बच्चे भीख मांगने को मजबूर हैं और जो भीख नहीं मांगते वोह चोरी करते हैं। क्यू मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे चर्च हर गली मोहल्ले में होते हुए भी लोगों की भूख नहीं मिटा सकते। हिंदू मुस्लिम सिख इसी के बजे इन्सान अगर इंसानियत के लिए धार्मिक हो जाए तो भागवान अपने आप खुश हो जायेंगे । ज्यादा कुछ नहीं एक दिन में सिर्फ़ एक आदमी का पेट अगरआप भर दे तो देश में कोई भूखा न सोये। हमें यह याद रखना चाहिए की भागवान पत्थेर की मूर्ति में नहीं लोगो के दिल में बसते है।

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