मंगलवार, 3 जनवरी 2017

क्या नोटबंदी अकेला विकल्प था कालेधन के खिलाफ ?



नोटबंदी को सरकार कालाधन के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार मानकर आगे बढ़ी लेकिन जैसे जैसे दिन बीते बैंकों की कतारें बढ़ने लगी और एटीएम कैशलेस हो गये...लेकिन फिर भी लोग सरकार के साथ खड़े दिखे... घंटों लाइन में लग कर भी हर तकलीफ सहने का जज्बा उनमें दिखा... देश की खातिर ये सब सहन कर रहे थे लेकिन दिन बीतने के साथ भी जब हालात सुधरते नहीं दिखे तो सब्र का बांध टूटने लगा...कहते हैं कि व्यवस्था के फैसले पर सवाल खड़े करने के अधिकार की जगह अगर जनता पर महज रजामंदी जाहिर करने का दबाव हो तो ये लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। इस सैद्धांतिक टेक के साथ नोटबंदी के सरकार के हालिया फैसले पर गौर करें तो इसे फौरी तौर पर सराहने वाले भी अब कहने लगे हैं कि सरकार ने ये फैसला जल्दबाजी में लिया है। बेहतर होता कि सरकार फैसले के इस विकल्प तक पहुंचने से पहले और थोड़ा सोच लेती.... लोगों की जुबां पर न सही लेकिन हर किसी के जहन में ये सवाल जरूर आया कि आखिर नोटबंदी के बड़े एलान से पहले सरकार ने ऐसी पक्की व्यवस्था क्यों नहीं कि जिससे आमजनों को हो रही परेशानी से बचाया जा सकता। ये भी कि क्या ये कालेधन से निपटने का एकमात्र मुफीद तरीका रह गया था?


कई विशेषज्ञ ये मानते हैं कि सरकार के पास तमाम ऐसी जानकारियां हैं, जिससे वे अवैध धन इकट्ठा करने वालों के गिरेबान सीधे पकड़ सकती है.... मोदीजी खुद कहते रहे हैं कि सरकार की नजर उन पर है जो कालाधन दबाए बैठे हैं


दिलचस्प बात ये है कि फैसला नोट बदलने का लिया गया और धरपकड़ तब शुरू हुई जब लोगों ने शिकायत की कालाधन रखने वाले इसमें भी जुगाड़ ढूंढ रहे हैं.. अर्थव्यवस्था को जानने और समझने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि पुराने बड़े नोटों को अमान्य करने का जो काम अचानक हुआ उसकी जगह क्रमिक तौर पर छपाई बंद करने का विकल्प ज्यादा बेहतर होता। इससे धीरे-धीरे बड़े नोट खुद ब खुद प्रचलन से बाहर हो जाते। पर सरकार ने ऐसा न कर एक ऐसा फैसला किया जिसमें घुन और गेंहू साथ-साथ पिस रहे हैं। ये तमाम सवाल मौजूदा हालात में इसलिए जरूरी हैं क्योंकि सरकार की तरफ से अब भी कोई ऐसा आश्वासन नहीं कि वो आमजनों की परेशानी के साथ बिगड़े हालात पर जल्द काबू पा लेगी। एटीएम में कैश भले ही डल रहा हो लेकिन बैंकों से पैसा निकलने की लिमिट अब भी तय है जब ये पाबंदी नहीं हटेगी तब तक हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते....


वित मंत्री अरूण जेटली बड़े आराम से ये कह कर निकल जाते हैं कि सरकार का हैरान करने वाला ये कदम अगर पहले से बता देते तो इसकी गोपनीयता खत्म हो जाती लेकिन इसके लिये आम लोगों के सब्र की परीक्षा लेने का विकल्प ही क्यों सरकार को पंसद आया इसका सीधा जवाब सरकार की तरफ से कोई नहीं दे रहा। प्रक्रिया की जटिलता और इसमें लगने वाले समय ने लोगों को जो तकलीफे दी... लाइनों में लग कर जिन लोगों ने जान गवाई उनके परिवार ये सवाल क्यों न करें कि सरकार कालेधन वालो को सजा दे रही है या उन्हें.....विकल्प की बात हो तो ये सवाल तर्क के लिहाज से और वाजिब तब लगता है जब समाज का हर तबका इससे परेशान हो.... सवाल ये है कि सरकार को भी पता था कि देश में कुल 17 लाख करोड़ की करेंसी में 8.2 लाख करोड़ (5०० के नोट) और 6.7 लाख करोड़ (1००० के नोट) पूरी करेंसी का 86 फीसदी हैं, जो अब प्रचलन से बाहर हो गए हैं। इससे पैदा होने वाले संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में नगदी नोटों से आम जनता की अर्थव्यवस्था चलती है, जबकि बड़े लोग बैंकिग प्रणाली से कारोबार करते हैं। सरकार चाहती तो ऐसे में 2.7 लाख करोड़ के रोजाना बैंकिग ट्रांजेक्शन और सालाना 8०० लाख करोड़ के बैंकिग कारोबार में बड़े लेनदेन को सीधे अपने स्कैन पर ले सकती थी और जांच के बाद संबंधित लोगों-कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती थी। सीबीआई डायरेक्टर एपी सिह ने फरवरी 212 में ये बताया था कि कालेधन के नाम पर लगभग 3० लाख करोड़ रुपए विदेशों में जमा हैं। 214 के लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी ने इस धन को देश में लाने की बात कही थी। पर अब इस वादे को पूरा करने के बजाय सरकार देश की मुद्रा व्यवस्था को बदलने की एक ऐसी कार्रवाई कर रही है जिसने जनता को बैठे-बिठाए मुसीबत में डाल दिया है जबकि सरकार के सामने दूसरे विकल्प भी थे। हाल के पनामा लीक्स में देश के
5०० रसूखदार तथा एचएसबीसी में 1,195 लोगों के पास कालाधन होने का पता चला था। इसी तरह कुछ बड़े उद्योगपतियों द्बारा बैलेंसशीट में गड़बड़ी करके सरकारी बैंकों से 15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का लोन लिया गया जिसमें अधिकांश एनपीए में तब्दील हो गया है। और तो और रिजर्व बैंक का खुद का आंकड़ा है कि पिछले 44 वर्षों में एक्सपोर्ट और ओवर इनवाइसिग के माध्यम से बड़ा घोटाला हुआ है जो कुल जीडीपी का एक चौथाई हो सकता है। सरकार चाहती तो ऐसे बड़े समूहों और उद्योगपतियों के फारेंसिक और सीएजी ऑडिट कराने का फैसला कर सकती थी। इससे देश में एक नए कारोबारी वित्तीय अनुशासन को अमल में लाने का श्रेय भी सरकार को मिलता। पर उसने ऐसा नहीं करके बेकसूर आम जनता के लिए परेशानी बढ़ाने वाला फैसला लिया।
साफ है के कालाधन के खिलाफ सार्थक और अचूक कार्रवाई के बजाय सरकार एक ऐसे कदम को तरजीह दे रही है जिसका फायदा वो राजनीतिक लोकप्रियता के लिए कर सके।




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