मंगलवार, 3 जनवरी 2017

करेन्सी पर 'वार' हुआ कामयाब?




पीएम नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एलान किया... इसे एक रास्ता बताया कालेधन को खत्म करने का... लेकिन आंकड़े तो कुछ और कहते हैं आंकड़े ही क्यों खुद प्रधानमंत्री बोल चुके हैं कि बच्चा बच्चा जानता है कि कालाधन विदेश में हैं



सच ये है कि करेन्सी पर 'वार' कर ज्यादा से ज्यादा उतने ही काले धन को निशाना बनाया जा सकता है जो मुद्रा के तौर पर चलन में है. जैसे अभी तक 14 लाख करोड़ रुपये मूल्य से कुछ ज़्यादा के पाँच सौ और हज़ार के नोट चलन में थे, जो देश की जीडीपी के दस प्रतिशत के बराबर है. अनुमान है कि पाँच सौ और हज़ार के इन नोटों का क़रीब एक चौथाई हिस्सा काला धन है, जो हुआ क़रीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये. यानी जीडीपी का कुल ढाई प्रतिशत. अब इसमें से जो भी काला धन सरकार की पकड़ में आ जाये, वो आ जाये. ज़ाहिर है कि ये पूरी काली अर्थव्यवस्था की एक चुटकी भर रक़म ही होगी और इसका ऐसा असर कैसे होगा कि आगे काला धन बनना बन्द हो जाये! खुद पीएम और जानकार मानते हैं कि कालाधन ज्यादातर विदेशों में जमा है कुछ एक्सपर्ट तो यहां तक कह रहे हैं कि 90% कालाधन विदेशी मुद्रा में होता है न कि भारतीय नोट की शक्ल में.... तो फिर सवाल ये है कि आखिर देश में नोटबंदी का फायदा क्या हुआ ?

अपने देश के वित्तीय इतिहास को खंगाले तो इससे पहले दो बार बड़े नोटों पर तथाकथित 'सर्जिकल स्ट्राइक' की जा चुकी है. पहली बार 1946 में एक हज़ार और दस हज़ार रुपये के नोट बन्द किये गये थे. उसके बाद 1978 में मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने एक हज़ार, पांच हज़ार और दस हज़ार के नोट बन्द किये थे. देसाई सरकार में मनमोहन सिंह ही वित्त सचिव थे. मक़सद यही था. काले धन को बाहर निकालना. लेकिन दोनों बार इस मक़सद में कोई कामयाबी नहीं मिल सकी. ये बात ख़ुद वित्त मंत्रालय की 2012 की उस रिपोर्ट में दर्ज है, जिसे केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष के नेतृत्व में बनी कमेटी ने पेश की थी. शायद पुराना अनुभव था. इसीलिए मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने तो बड़े नोटों को रद्द करने के सुझावों को उन्होंने कभी गम्भीरता से नहीं लिया. और मोदी के नोटबंदी के खिलाफ भी संसद में बयान दिया...

सिर्फ अपने देश की बात क्यों करें विदेशों में भी कोई ऐसा उदाहरण नहीं है जहां नोटबंदी ने कालेधन को खत्म किया हो...पड़ोसी म्यांमार में 1964 और 1985 में यही प्रयोग किया गया और नाकामयाबी हाथ लगी. इसके बाद भी वहां तीसरी बार फिर 1987 में मुद्रा रद्द कर दी गयी इस बार तो ये लोगों के लिये भारी मुसीबतें लाई क्योंकि जब तीसरी बार ये किया गया तो पुराने बड़े नोटों के बदले में कुछ भी दिया नहीं गया. यानी क़रीब तीन-चौथाई मुद्रा लोगों के हाथ से बिलकुल निकल गयी. लेकिन इतने कड़े फैसले के बाद भी क्या वहां काले धन की समस्या ख़त्म हो गयी? नहीं. बल्कि उससे हुआ ये कि वहां के वित्तीय संस्थानों से लोगों का भरोसा उठ गया और पैसा सिर्फ़ ज़मीन और सोने में लगाया जाने लगा. जिसके नतीजे और गंभीर हो गये क्योंकि ये स्थिति अर्थव्यवस्था को जड़ कर देती है सोने और ज़मीन में लगे धन का इस्तेमाल किसी उत्पादक काम में तो होता नहीं तो अर्थव्यवस्था का पहिया कैसे घूमे?
इसी तरह श्रीलंका में भी 1970 में ऐसा किया जा चुका है. वहां तो सौ और पचास तक के नोट बदल दिए गये थे. लेकिन ये प्रयोग भी विफल ही रहा. इधर वेनेजुएला को ही लीजिए जिसने भारत की नोटबंदी के बाद अपने यहां भी इसे किया लेकिन एक हफ्ते में बवाल के बाद फैसले को सरकार को वापस लेना पड़ा....






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