काले
धन का सीधा रिश्ता टैक्स चोरी
है लेकिन इसमें भ्रष्टाचार,
ड्रग्स
व्यापार,
हथियारों
की तस्करी,
हवाला,
आतंकवाद
सब शामिल हैं...
विदेशी
बैंकों में जो काला धन जमा है
वो देश की साधारण जनता का है,
ग़रीबों,
किसानों,
कुलियों
और मज़दूरों का है.
एक तरफ अरबों का कालाधन है और दूसरी तरफ मौजूदा वक्त में देश के आम लोग हर रोज जूझ रहे हैं कभी महंगाई तो कभी अपने जीवन स्तर को सुधारने की कोशिश में... बीते एक बरस में देश में प्रति व्यक्ति आय की रफ्तार में महज 8हजार रुपये की बढोतरी हुई है और इसी दौर में बीपीएल परिवारों की लकीर प्रतिदिन 27 रुपये और 35 रुपये की बहस अटकी है यानी जब देश में एक तरफ 40 करोड लोग सालाना 10 हजार रुपये से कम पाते हो । और दूसरी तरफ प्रति व्यक्ति आय सालाना 93,293 हजार रुपये आते हो । तो समझ लेना चाहिये कि देश में असमानता की खाई कितनी चौडी है इस खाई को पाटने के लिये आठ नवंबर 2016 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक ऐलान करते हुए समाजवाद का सपना नोटबंदी के जरीये जगाया...
कालेधन को खत्म कर लोगों के हक की बात की तो पूरा देश प्रधानमंत्री के पीछे खड़ा नजर आया.. .पीएम ने कहा तो कि कालाधन की गंभीर बीमारी का इलाज नोटबंदी से हो जाएगा लेकिन क्या वाकई नोट बदलने से काला धन ख़त्म हो जायेगा? बहस जारी है अर्थशास्त्री मानते हैं कि काला धन मतलब करेन्सी नहीं है करेन्सी का काम लेन-देन करना है ये धन नहीं है करेंसी बदलकर काला धन खत्म नहीं होगा. क्योंकि काला धन सिर्फ करेंसी में नहीं है ये धन देश के अलावा हवाला से बाहर जाकर विदेशी बैंकों और विदेशी कम्पनियों में लगा है... ये काला धन विदेशी निवेश के रूप में वापस शेयर बाजार में भी आता है और यही काला धन राजनीति में चंदे के रूप में भी लगा होता है... 500 और 1000 रु के नोट बंद कर काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' और नरेन्द्र मोदी का 'मास्टरस्ट्रोक' बताया जा रहा है... नोटबंदी सरकार का साहसिक कदम है क्योंकि अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक असर होगा इस बात को हर कोई मान रहा था...सोचिए जहां अर्थव्यवस्था में 1000 के नोटों की संख्या 7 % और 500 के नोटों की संख्या 17.4% हो और जिन नोटों की कीमत पूरी अर्थव्यवस्था में मौजूद करेंसी की 64% हो जिसमें 24% 1000 के नोट और 40% 500 रु के नोट हो वहां रातों रात इसे बदलना कैसे आसान होगा.... सबसे बड़ा मसला उनका है जिनका घर नकद से चलता है देश में 47 करोड़ मजदूरों में से 41 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं इन 41 करोड़ मजदूरों में से भी 32 करोड़ सीधे नकदी कारोबार से जुड़े हैं.... इसके अलावा किसान छोटे व्यापारी.... दुकानदार सब नोटबंदी को लेकर पहले खुश दिखाई दिए लेकिन बाद में नोट बदलवाने की लाइनों में अपना वक्त बर्बाद होते देख अव्यवस्था को लेकर परेशान दिखे...
यानि नोटबंदी से क्या मिला ये सवाल फिर वहीं आकर अटकता है दरअसल जिस उम्मीद के साथ कालेधन पर सर्जिकल सट्राइक हुई वो पूरी करने के लिये सिर्फ नोट बदलना काफी नहीं...नोटबंदी के कुछ दिन बाद ही विपक्ष के हमले झेल रही मोदी सरकार ने भी अपना स्टैंड बदला और कैशलेस इकॉनोमी बनाने पर जोर दिया... यानि कैशलेस कैसे होगा देश जहां अरबो खरबों का पूरा साम्राज्य काम कर रहा है टैक्स चोरी के नये नये पैंतरें अपना कर बड़े उद्योग काली कमाई के दम पर चल रहे हैं रियल एस्टेट बाजार में कालाधन सफेद होता है जहां एक तरफ़ बिल्डर हैं, जो नम्बर दो के पैसे लेते हैं और अपने तमाम प्रोजेक्टों में उसे ईंट-गारे में खपा देते हैं. दूसरी तरफ़ होते हैं आम ख़रीदार जो सम्पत्ति की ख़रीद-फ़रोख़्त में काला धन लगाते हैं. और उनका क्या जो छोटे-बड़े कारोबार चलाते हैं... डॉक्टर-वकील जैसे पेशों से जुड़े हैं जो अपनी पूरी आमदनी घोषित नहीं करते और इस तरह अर्थव्यवस्था में काला धन जोड़ते हैं. बात तो उनकी भी है कि रिश्वत देते और लेते हैं जो अपनी ऐसी कमाई घोषित ही नहीं कर सकते.
एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था के लूपहोल और जांच एंजेसियों में स्टाफ की कमी या सिस्टम में भ्रष्टाचार कालेधन को बढ़ाता है जो महज नोटबंदी से साफ होने वाला नहीं.... धन उगाही और इसे ब्लैक से व्हाइट करने में लगी हज़ारों लाखों कम्पनियाँ, फ़र्ज़ी आयात-निर्यात का मकड़जाल, काग़जों पर काली खेती, तरह-तरह के ट्रस्ट, धार्मिक संस्थाएँ और कई तरह के और उपकरण हैं, जहां जुगाड़ से 'बड़ा काला धन' सफ़ेद हो जाता है. इन छोटे छोटे ब्लैकमनी के गढ़ पर नोटबंदी के सर्जिकल स्ट्राइक का कितना असर होगा ये अभी कोई नहीं कह सकता...
एक तरफ अरबों का कालाधन है और दूसरी तरफ मौजूदा वक्त में देश के आम लोग हर रोज जूझ रहे हैं कभी महंगाई तो कभी अपने जीवन स्तर को सुधारने की कोशिश में... बीते एक बरस में देश में प्रति व्यक्ति आय की रफ्तार में महज 8हजार रुपये की बढोतरी हुई है और इसी दौर में बीपीएल परिवारों की लकीर प्रतिदिन 27 रुपये और 35 रुपये की बहस अटकी है यानी जब देश में एक तरफ 40 करोड लोग सालाना 10 हजार रुपये से कम पाते हो । और दूसरी तरफ प्रति व्यक्ति आय सालाना 93,293 हजार रुपये आते हो । तो समझ लेना चाहिये कि देश में असमानता की खाई कितनी चौडी है इस खाई को पाटने के लिये आठ नवंबर 2016 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक ऐलान करते हुए समाजवाद का सपना नोटबंदी के जरीये जगाया...
कालेधन को खत्म कर लोगों के हक की बात की तो पूरा देश प्रधानमंत्री के पीछे खड़ा नजर आया.. .पीएम ने कहा तो कि कालाधन की गंभीर बीमारी का इलाज नोटबंदी से हो जाएगा लेकिन क्या वाकई नोट बदलने से काला धन ख़त्म हो जायेगा? बहस जारी है अर्थशास्त्री मानते हैं कि काला धन मतलब करेन्सी नहीं है करेन्सी का काम लेन-देन करना है ये धन नहीं है करेंसी बदलकर काला धन खत्म नहीं होगा. क्योंकि काला धन सिर्फ करेंसी में नहीं है ये धन देश के अलावा हवाला से बाहर जाकर विदेशी बैंकों और विदेशी कम्पनियों में लगा है... ये काला धन विदेशी निवेश के रूप में वापस शेयर बाजार में भी आता है और यही काला धन राजनीति में चंदे के रूप में भी लगा होता है... 500 और 1000 रु के नोट बंद कर काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' और नरेन्द्र मोदी का 'मास्टरस्ट्रोक' बताया जा रहा है... नोटबंदी सरकार का साहसिक कदम है क्योंकि अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक असर होगा इस बात को हर कोई मान रहा था...सोचिए जहां अर्थव्यवस्था में 1000 के नोटों की संख्या 7 % और 500 के नोटों की संख्या 17.4% हो और जिन नोटों की कीमत पूरी अर्थव्यवस्था में मौजूद करेंसी की 64% हो जिसमें 24% 1000 के नोट और 40% 500 रु के नोट हो वहां रातों रात इसे बदलना कैसे आसान होगा.... सबसे बड़ा मसला उनका है जिनका घर नकद से चलता है देश में 47 करोड़ मजदूरों में से 41 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं इन 41 करोड़ मजदूरों में से भी 32 करोड़ सीधे नकदी कारोबार से जुड़े हैं.... इसके अलावा किसान छोटे व्यापारी.... दुकानदार सब नोटबंदी को लेकर पहले खुश दिखाई दिए लेकिन बाद में नोट बदलवाने की लाइनों में अपना वक्त बर्बाद होते देख अव्यवस्था को लेकर परेशान दिखे...
यानि नोटबंदी से क्या मिला ये सवाल फिर वहीं आकर अटकता है दरअसल जिस उम्मीद के साथ कालेधन पर सर्जिकल सट्राइक हुई वो पूरी करने के लिये सिर्फ नोट बदलना काफी नहीं...नोटबंदी के कुछ दिन बाद ही विपक्ष के हमले झेल रही मोदी सरकार ने भी अपना स्टैंड बदला और कैशलेस इकॉनोमी बनाने पर जोर दिया... यानि कैशलेस कैसे होगा देश जहां अरबो खरबों का पूरा साम्राज्य काम कर रहा है टैक्स चोरी के नये नये पैंतरें अपना कर बड़े उद्योग काली कमाई के दम पर चल रहे हैं रियल एस्टेट बाजार में कालाधन सफेद होता है जहां एक तरफ़ बिल्डर हैं, जो नम्बर दो के पैसे लेते हैं और अपने तमाम प्रोजेक्टों में उसे ईंट-गारे में खपा देते हैं. दूसरी तरफ़ होते हैं आम ख़रीदार जो सम्पत्ति की ख़रीद-फ़रोख़्त में काला धन लगाते हैं. और उनका क्या जो छोटे-बड़े कारोबार चलाते हैं... डॉक्टर-वकील जैसे पेशों से जुड़े हैं जो अपनी पूरी आमदनी घोषित नहीं करते और इस तरह अर्थव्यवस्था में काला धन जोड़ते हैं. बात तो उनकी भी है कि रिश्वत देते और लेते हैं जो अपनी ऐसी कमाई घोषित ही नहीं कर सकते.
एक्सपर्ट ये भी कहते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था के लूपहोल और जांच एंजेसियों में स्टाफ की कमी या सिस्टम में भ्रष्टाचार कालेधन को बढ़ाता है जो महज नोटबंदी से साफ होने वाला नहीं.... धन उगाही और इसे ब्लैक से व्हाइट करने में लगी हज़ारों लाखों कम्पनियाँ, फ़र्ज़ी आयात-निर्यात का मकड़जाल, काग़जों पर काली खेती, तरह-तरह के ट्रस्ट, धार्मिक संस्थाएँ और कई तरह के और उपकरण हैं, जहां जुगाड़ से 'बड़ा काला धन' सफ़ेद हो जाता है. इन छोटे छोटे ब्लैकमनी के गढ़ पर नोटबंदी के सर्जिकल स्ट्राइक का कितना असर होगा ये अभी कोई नहीं कह सकता...
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